एक साल से अपनों का इंतजार कर रहे 14 अस्थियों को भू-विसर्जन से मिला मोक्ष

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सच दिखाने की जिद...

समाजसेवी संस्था ने आगे आकर अपनों की तहर विधि—विधान से कराया अस्थि विसर्जन
जन एक्सप्रेस संवाददाता
कानपुर नगर। कोरोना महामारी ने देश और दुनिया में ऐसी समस्याओं को लोगों के सामने ला खड़ किया कि अपनों से रिश्ते भी पराये हो गए। उप्र के कानपुर में ऐसा रिश्तों की दूरियों का प्रकरण सामने आया है जो दिलों को झकझोर कर रख देगा। यहां पर कोरोना काल में मरने के बाद मोक्ष पाने के लिए 14 अस्थियों के कलश एक साल तक इंतजार करते रहें। जब कोई अपना इन्हें लेने नहीं आया तो परायों ने ही अपनों की तरह इन्हें विधि—विधान से मोक्ष प्रदान कराया।
दरअसल, कानपुर महानगर में पिछले एक साल से कोरोना ने मानव जीवन को बदल कर रख दिया था। महामारी के दौर में इंसान अपने अस्तित्व को बचने के लिए एक ऐसा युद्ध लड़ रहा था, जो थमता नजर नहीं आ रहा था। उस दौरान हमें समाज के कई चेहरे देखने को मिले। कोरोना से लड़ते हुए जिन लोगों ने अपनी जान गवां दी, उन्हें इसके खौफ ने अपनों से भी थोड़ा नहीं बहुत दूर कर दिया। जान गंवाने वालों के शवों को सरकारी तंत्र ने किसी तरह से दाह संस्कार कर जिम्मेदारी पूरी कर ली, लेकिन उनकी अस्थियों को आज भी उनके अपने से मोक्ष द्वार (विसर्जन) का इंतजार था। यह देखते—देखते 14 अस्थि कलशों में बंद असमय जान गंवाने वाले एक साल से उनकी राह ताकते रहें, लेकिन उनका इंतजार खत्म नहीं होता दिखा। अस्थि कलशों को लेने के लिए कोई भी नहीं आया। यह देख शहर की स्वंय सेवा संस्था एक बार फिर आगे आया और उसने यह जिम्मेदारी निभाने का फैसला किया। अपने कंधे पर अस्थियों के विसर्जन का बेड़ा उठाते हुए सामाजिक संस्था ने गंगा किनारे मंत्रोच्चारण के साथ उन्हें भैरवघाट पर भू—विसर्जित कर मोक्ष प्रदान कराया। अस्थि विसर्जन के दौरान पूर्व महापौर जगतवीर सिंह द्रोण, पं रामजी त्रिपाठी सहित अन्य लोग उपस्थित रहें।
युग दधिचि देहदान संस्था के अभियान प्रमुख व सामाजिक कार्यकर्ता मनोज सेंगर ने बताया कि कोविड का संक्रमण ना फैले इसके लिए कोविड से मरने वालों का दाह संस्कार विद्युत शवदाह गृह में कर दिया गया था। ऐसे में अस्पताल से कई शवों को लेने वाले लोग जब नहीं पहुंचे तो मानवीय भावनाओं का ख्याल रखते हुए उनका दाह संस्कार कर अस्थियों को सुरक्षित कर दिया गया। ताकि भविष्य में मृतक के परिजन आकर उनका विधिवत विसर्जन कर सकें। लेकिन अब एक साल के बाद भी कोई नहीं आया, तो अब इस कार्य को विधिवत समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा संपन्न कराया गया। साथ ही गंगा में प्रवाहित करने के बजाए अस्थियों का भू—विसर्जन कर पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी संदेश दिया।

 


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