“टकराव” ही खासियत है योगी की …

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जिनका योगी बनने से पहले का नाम अजय सिंह विष्ट है तथा जिनका आज यानि 5 जून को जन्म दिवस है, के बारे में कहा जाता है कि उनकी सबसे बड़ी खासियत “टकराव” है। यह “टकराव” की ही राजनीति है जिसने उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का पहला गैर संघी मुख्यमंत्री बनाने को मजबूर किया। गैर संघी शब्द का इस्तेमाल मैंने यहां इसलिए किया है क्योंकि उनका जुड़ाव कभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नहीं रहा, इसके बावजूद यदि उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो इसका कारण यह था कि उनके तेवर एक तरफ तो महंत दिग्विजयनाथ के थे तो उनके अंदर सामाजिक सेवा कार्य का भाव महंत अवैद्यनाथ के कारण था । यह दो ऐसे महान विभूतियों का योग था जिसने योगी आदित्यनाथ को आज सत्ता के शिखर पर लाकर बैठा दिया है। भाजपा के लिए कल का एंग्री यंग मैन जिनका आज जन्मदिन है, को न वे निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। क्योंकि दोनों आज एक दूसरे की जरूरत हैं।

योगी भाजपा को छेड़कर पूर्वांचल में वह नहीं कर सकते जो वे करना चाहते हैं। उसी तरह भाजपा चाह कर योगी को दरकिनार नहीं कर सकती। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे ज्यादा उनकी ‘मास’ अपील है और उनकी पहचान एक कट्टर फायर ब्रांड हिंदू नेता की है। 2017 का विधानसभा चुनाव भले ही उस समय प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर लड़ा गया था और जिसमें भाजपा को करीब सवा तीन सौ सीटें मिली थी। लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव तमाम किंतु और परंतु के बावजूद योगी जी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा? और शायद यही योगी भी चाहते हैं। अपनी कड़क मिजाजी और तुनक मिजाजी के जरिए योगी आदित्यनाथ भाजपा हाईकमान को भी यह संदेश देना चाहते हैं कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में अभी उनके समकक्ष कोई नेता नहीं है।

यानि योगी को मोदी के अलावा और कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी, योगी के बढ़ते प्रभाव से बहुत ज्यादा खुश नहीं है लेकिन वे चाहकर भी गोरखनाथ मंदिर से राजनेता बने योगी आदित्यनाथ से सीधे ‘टकराव’ भी नहीं लेना चाहते। इसे अगर दूसरे शब्दों में मैं कहूं तो न तो योगी आदित्यनाथ मोदी के खिलाफ विद्रोह करना चाहते हैं और न ही प्रधानमंत्री मोदी उन्हें किसी भी तरह से अस्थिर करना चाहते हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दोनों के बीच किसी भी तरह का ‘टकराव’ नहीं है। लेकिन जिसकी खासियत ही ‘टकराव’ हो तथा जिसने हिंदू युवा वाहिनी का गठन ही ‘टकराव’ तथा हिंदुओं के उत्थान के लिए किया हो उसे ‘टकराव’ की न तब चिंता थी, जब 1994 में वह पूर्ण संन्यासी बना था और न आज है।

आज अगर योगी के समर्थक उन्हे भविष्य के प्रधानमंत्री तथा नरेंद्र मोदी का विकल्प के रूप में देख रहे हैं तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं। क्योंकि महत्वाकांक्षी होना मानव का स्वभाव है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लगभग साढ़े चार साल में योगी ने अपनी छवि केवल एक कट्टर हिंदू नेता के रूप में नहीं बल्कि एक सख्त प्रशासक के रूप में गढ़ी है। एक ऐसा प्रशासक, जिससे आंख से आंख मिला कर बात करने की ताकत उसके स्वयं के मंत्री परिषद के सदस्यों में भी नहीं है, ऐसे में अगर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को वन मैन शो की संज्ञा से नवाजा जाए तो कतई गलत नहीं होगा।

क्योंकि योगी अपने मंत्रिपरिषद के सदस्यों की अपेक्षा अपने नवरत्नों पर ज्यादा विश्वास करते हैं। यह वही नवरत्न हैं, जिन्होंने न केवल मंत्रियों बल्कि सांसदों, विधायकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं को कोरोना कालखंड में यह बता दिया कि फिलहाल उनकी शिकायतों और शिकायती पत्र से कुछ होने वाला नहीं है। क्योंकि 2022 का चुनाव योगी जी मेरिट के आधार पर लड़ेंगे, अपनी उपलब्धियों के आधार पर लड़ेंगे और हिंदुत्व के धार को गोठिल भी नहीं होने देंगे। और न ही अनावश्यक हस्तक्षेप तथा समानांतर व्यवस्था चलने देंगे।

2022 के चुनाव परिणाम योगी आदित्यनाथ की दिशा और दशा भले ही न बदल सकें लेकिन राजनीति के पटल पर अगर कोई गुल खिलता है तो किसी को कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए क्योंकि यही योगी जी की खासियत है।

ऐसे में योगी जी को ‘हैप्पी बर्थ डे’ तो आज कहना बनता ही है।


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