ऊल नदी पर जलकुंभी के डेरे से प्रदूषण का खतरा

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सच दिखाने की जिद...

जन एक्सप्रेस/सुनहरा।
लखीमपुर-खीरी। कि हमारी आस्था की पवित्र और संस्कृति से जुड़ी नदियां प्रदूषित हो रही हैं।
सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक जीनदायिनी कही जाने वाली ये नदियां खुद खतरे में हैं। महेवागंज स्थित ऊल नदी के पुल पर नजर डाली जाए तो हरियाली ही दिखाई देगी पानी के दर्शन होना दुर्लभ हो जाएगा क्योंकि जल कुंभी पूरी तरह से नदी पर छा सी गई है।जलीय कुम्भी नदी के जल को कुपोषित करने के साथ साथ कईं जलचरों की साँसे भी अवरुद्ध कर देती है।जिससे या तो जलीय जीवन समाप्त हो जाता है जल कुम्भी ने घेर लिया है। जो प्रदूषण फैलता है जल कुंभी की जकड़ में बुरी तरह से फंसी ऊल नदी में पुल से लोग खन्डित मूति पूजा में प्रयोग की गई पूजन सामग्री दुर्गाभिषेक में प्रयोग की गई प्रतिमा की मिट्टी दूध आदि प्रवाहित किया जाता है। जैसे किसी की मृत्यु के अन्तिम संस्कार के बाद स्थान मुण्डन अन्नप्रसान और दुर्गा पूजा के दौरान मूर्ति विसर्जन और होने से नदी और भी प्रदूषित हो रही है
जलकुम्भी से जकड़ी ऊल नदी एक अप्राकृतिक पर्यावरण प्रणाली को दर्शाती है।नेशनल बॉटनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि जल कुम्भी पानी में निरंतर स्थिरता या युट्रोफिकेशन के कारण बढती है।जल के ठहराव के कारण ही ऊल में जल कुम्भी को पनपने का अवसर मिल रहा है। जलकुंभी की वजह से नदी के पानी तक सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पा रही हैं जिससे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। ऐसे में जलीय पौधे व जलीय जन्तु के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।
इसी ऊल नदी के समीप एक हॉस्पिटल का निर्माण हो रहा है आसपास काफी दुकानें लगी हुई हैं लेकिन किसी जिम्मेदार की नजर इस नदी पर जमी जलकुंभी पर नहीं जाती जो इसकी सफाई की जाए स्वच्छ किया जाए स्वच्छता पर माननीय प्रधानमंत्री द्वारा काफी बड़ी बड़ी बातें की जाती है नदियों को स्वच्छ करने के लिए सरकार भी प्रयासरत है। लेकिन ऊल नदी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है जिम्मेदारों की नजर उस ओर नहीं जा रही है बताते चलें भारतीय जनजीवन में नदियों महत्व इसी से जाना जा सकता है कि धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक, पर्यटन, स्वास्थ्य, कृषि, शैक्षिक, औषधि, पर्यवरण और न जाने कितने क्षेत्र हैं जो हमारी नदियों से सीधे-सीधे जुडे़ हुए हैं। किसी भी अन्य सभ्यता से बहुत लंबे समय तक हमनें नदियों को धर्म से जोड़ कर इन्हें स्वच्छ और पवित्र भी बनाए रखा। हमारे भारत देश में नदियों की पूजा करने की परंपरा रही है। नदियों को देवी देवताओं के समक्ष माना जाता रहा है। अनेक नदियों को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा करना हमारी संस्कृति की परंपरा रही है।आज भी लगभग सभी नदियों को मां के रूप में सम्मान दिया जाता है। गंगा ही नहीं,देश की दूसरी नदियों के प्रति भी हमारे मन में गहरी आस्था है।यह हमारे संस्कार का हिस्सा बन चुका है।इससे स्पष्ट है कि भारत में प्राचीन काल से ही नदियों का अत्यधिक महत्व रहा है और आज भी बहुत हद तक हमारा जीवन नदियों पर निर्भर है। इनके प्रति सम्मान का भाव बनाए रखना इसलिए जरूरी है। ताकि हम इनकी स्वच्छता और पवित्रता को चिरकाल तक बनाए रख सकें। इनका जल हमारे लिए उपयोगी हो सकेगा और हम लंबे समय तक इनका लाभ उठा सकेंगे।

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