‘लोकल फॉर वोकल’ का खादी के कारोबार पर असर

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‘खादी को कपड़े की तरह नहीं, बल्कि आंदोलन की तरह देखें’ : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

नई दिल्ली, (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते रहे हैं कि ‘खादी को कपड़े की तरह नहीं, बल्कि आंदोलन की तरह देखें।’ उनकी बात का असर खादी ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के व्यापार पर दिखा है। लोगों ने आगे बढ़कर स्वदेशी को महत्व दिया और खादी को अपनाया है। इस असाधारण परिस्थिति में भी केवीआईसी वित्त वर्ष 2020-21 में 95,741.74 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड कारोबार करने में सफल रही है।

अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 सितंबर, 2017 को कहा था, “मैंने एक बार खादी के विषय में चर्चा की थी कि खादी एक वस्त्र नहीं, एक विचार है। मैंने देखा कि इन दिनों खादी के प्रति काफी रुचि बढ़ी है। मैं कोई खादीधारी बनने के लिए नहीं कह रहा हूं, लेकिन जब अलग-अलग तरह के परिधान होते हैं तो एक खादी क्यों न हो।”

उन्होंने कहा था, “दो अक्टूबर से खादी में छूट दी जाती है। मैं फिर एक बार आग्रह करूंगा, खादी का जो अभियान चला है, उसको हम और आगे चलायें और बढ़ायें। खादी खरीद कर गरीब के घर में दिवाली का दीया जलायें। इस भाव को लेकर हम काम करें। हमारे देश के गरीब को इस कार्य से एक ताकत मिलेगी।”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों का लोगों के दिलो-दिमाग पर गहरा असर हुआ है। लोग खादी को महत्व देने लगे हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में केवीआईसी का कारोबार 88,887 करोड़ रुपये का था। लेकिन 2020-21 में खादी आयोग ने अपने कारोबार में 7.71 फीसदी की बढ़ोत्तरी की है। साधारण व्यापारी भी मानते हैं कि कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई विपरीत परिस्थिति में इस वृद्धि का बड़ा महत्व है।

सच तो यह है कि नरेन्द्र मोदी सरकार में खादी आयोग अपने कारोबार में लगातार वृद्धि दर्ज कर रहा है। 2018-19 की अपेक्षा 2019-20 में खादी आयोग ने अपने कारोबार में 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। इस उद्योग से जुड़े लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में खादी की स्वीकार्यता बढ़ी है और पिछले पांच साल के दौरान ग्रामोद्योग क्षेत्र का उत्पादन और उसकी बिक्री में लगभग 101 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई है।

वित्त वर्ष 2020-21 में तमाम कारोबार को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। चूंकि 25 मार्च, 2020 से पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया था तो इसका सीधा असर उत्पाद और बिक्री पर हुआ। इस दौरान खादी की सभी यूनिटें भी बंद हो गईं। बिक्री केंद्र भी अगले तीन महीने तक बंद रहे। इस तरह पूरा कारोबार प्रभावित हुआ। इसके बावजूद खादी आयोग ने अपने कारोबार को नई ऊंचाई देने में सफलता पाई है।

प्रधानमंत्री मोदी स्वयं हैं खादी के ब्रांड एंबेसडर

लोग-बाग इसका कारण प्रधानमंत्री मोदी की कारोबारी नीति को मान रहे हैं। कपड़ा उद्योग से जुड़े युवा कारोबारी गौरव बर्णवाल कहते हैं, “ग्रामीण उद्योग को विकसित करने का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है। वे स्वयं खादी के ब्रांड एंबेसडर हैं। उन्होंने खादी की लोकप्रियता को फिर से स्थापित कर दिया है, जिसका असर खादी आयोग के कारोबार पर दिखाई दे रहा है।”

गौरव कहते हैं कि खादी और मोदी 2014-15 से ही चर्चा में हैं। यह बात सच है कि मैंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पहले किसी राजनेता को खादी के विषय में विचार रखते हुए नहीं सुना। इसलिए खादी की बिक्री में उनके योगदान को खारिज नहीं किया जा सकता है।

 केवीआईसी के कैलेंडर पर विवाद

यह स्मरण होगा कि 2017 में खादी आयोग के कैलेंडर और डायरी पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर छापी गई थी। उसे विपक्षी पार्टियों ने बड़ा मुद्दा बना दिया था। तब भाजपा ने कहा था कि “गांधीजी हमारे दिल में हैं। हमारे काम में उनके आदर्श दिखते हैं।” भाजपा ने यह भी दावा किया था कि “कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान खादी की बिक्री मात्र 2-7 फीसदी थी, लेकिन भाजपा सरकार में यह बिक्री करीब 35 फीसदी तक बढ़ी है। क्या इससे गांधीजी खुश नहीं होंगे।”

इसके जवाब में कांग्रेस पार्टी ने सतही दलील दी थी। तब कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था, “खादी की सोच, खादी का प्रचार और चरखा, इसपर महात्मा गांधी के अलावा किसी का अधिकार नहीं हो सकता।” अच्छी बात यह रही कि राजनीतिक पार्टियों की नोक झोंक पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया और खादी को अपनाते गये।

प्रधानमंत्री मोदी खादी और चरखा का कराते रहते हैं स्मरण 

जब कभी खादी के प्रचार का अवसर आया, प्रधानमंत्री मोदी ने उस अवसर का भरपूर सदुपयोग किया। 18 अक्टूबर, 2016 में जब प्रधानमंत्री पंजाब गए तो वहां 500 महिलाओं को चरखा दिया। यह घटना उस अवसर की याद दिलाती है, जब 1945 में महात्मा गांधी के कहने पर के. कामराज ने 500 चरखे बांटे थे।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी रहे विकास सिंह कहते हैं, “महात्मा गांधी का मानना था कि खादी के जरिये गांव-गांव में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसलिए वे खादी को गांव-गांव पहुंचाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई रचनात्मक कदम उठाए। यहां तक कि खादी और चरखा को जीवन पद्धति और जीवन मूल्य से जोड़ा।” आगे वे कहते हैं कि आज गांधीजी के सपने को प्रधानमंत्री मोदी आगे बढ़ा रहे हैं।

आंकड़े भी इस बात को सही बताते हैं। इसका प्रमाण यह है कि 2017 में जब केवीआईसी का कैलेंडर विवाद चल रहा था, तो उस वर्ष खादी की बिक्री में 34 फीसदी वृद्धि हुई थी।


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