तपन बढते ही पाठा क्षेत्र मे प्यास बुझाने के लिए संघर्ष शुरू, पानी की तलाश बनी दिनचर्या

उत्तर प्रदेश
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मानिकपुर के अमचुर नेरूआ ग्राम पंचायत के खदरा सोसायटी गांव की हालत बेहद खस्ता
ग्रामीणों ने टैंकर चलाए जाने की मांग,टैंकर सप्लाई ही विकल्प
चित्रकूट। पाठा क्षेत्र पेयजल समस्या के लिए मशहूर है। पेयजल समस्या का कारण गर्मी आते ही जलस्तर खिसकने से जल संकट शुरू हो जाता है। जलस्तर गहराने का करण वर्षाजल का संचय न होना है। जब तक सरकार पाठा के पेयजल समस्या के तह तक नहीं जाएगी,तब तक इस समस्या को खत्म नहीं किया जा सकता है।
गर्मी शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही पानी की समस्या भी विकराल होती जा रही है। पाठा क्षेत्र के दर्जनों गांवों मे भीषण जल संकट मंडरा रहा है। पाठा के ग्रामीण इलाकों में लोगों को प्यास बुझाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
सरकार एक तरफ तो पानी की किल्लत को खत्म करने के लिए प्रयास कर रही है, दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारी पानी की समस्या का समाधान की ओर प्रभावी कदम नहीं उठा रहे हैं। करौंहा गोपीपुर,छेरिहाखुर्द, अमचुर नेरूआ, मड़ैयन, चुरेह कशेरुआ, ऊंचाडीह,रामपुर कल्याणगढ, जारोमाफी,खिचरी, इंटवा डुड़ैला, डोड़ामाफी, कर्कापड़रिया, एलहा बढैया आदि ऐसे गांव हैं, जिनमें लोग पेयजल के लिए तरस रहे हैं। लोग विभागीय  अधिकरियों के चक्कर लगाते थक चुके हैं। लेकिन अधिकारी सुनने को तैयार नहीं है। इससे ग्रामीणों में विभाग के प्रति रोष व्याप्त है।
कई तरह की पेयजल योजना के तहत पाठा मे करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद इन गांवों में पीने के लिए पानी नहीं है। मानिकपुर विकासखंड के अमचुर नेरूआ ग्राम पंचायत के खदरा सोसायटी गांव की हालत बेहद खस्ता है।
पाठा का जल बना’जहर’
कहते है “जल ही जीवन” लेकिन पाठा मे जल ही जहर हो गया है। यहां का जल जहर बनकर स्वास्थ्य को खराब कर रहा है। जिसे लाल जहर के नाम से जाना जाता है। इस जहर के पीने से लोगों को तमाम तरह की बीमारियां घेर रही हैं। पेट दांत,आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित होने का खतरा मंडरा रहा है। पेट संबधित बीमारियों के लोग भारी संख्या मे शिकार हो रहे हैं। यह लाल पानी तमाम तरह की बीमारी खुलेआम परोस रहा है। गर्मी के दिन शुरू होते ही पाठा क्षेत्र मे पेयजल की किल्लत शुरू हो जाती है। कुआं और तालाब तो सूख ही जाते हैं जहां पानी है भी तो गंदा। हैंडपंप लाल जहर उगल रहे हैं। लोगों के हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है। क्योंकि वहां पूरे इलाके का पानी ही लाल जहर बन गया है। यह तेजाब जैसा पानी स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर डाल रहा है।
पाठा क्षेत्र के गोपीपुर करौंहा, खिचरी,जारौमाफी, छेरिहाखुर्द, अमचुर नेरूआ, मारकुंडी,इंटवा डुड़ैला, मनगवां, टिकरिया जमुनिहाई,मड़ैयन,कर्कापड़रिया, बराहमाफी, चुरेह कशेरुआ, ऊंचाडीह,गोइया, पतेरिया,कटैयाडंडी, मनका, खोहर आदि ग्राम पंचायतों मे कुछ एसी ही हालत है। मानिकपुर विकास खंड के छेरिहाखुर्द, करौंहा, अमचुर नेरूआ और इंटवा डुड़ैला की स्थिति तो बेहद खराब रहती है। गर्मी आते ही इन गांवों के हैंडपंप हवा फेंकना शुरू कर देते हैं। मीलों दूर से लोग साइकिल और बैलगाड़ियों से पानी लाने को मजबूर हो जाते हैं।
कौन निकालेगा पाठा की पेयजल समस्या का स्थाई समाधान ?
पाठा की पेयजल समस्या दशकों पुरानी है। पाठा का नाम आते ही दो चीजें अनायास ही याद आ जाती हैं। पहला डकैतों का आतंक दूसरा पानी की किल्लत। मौजूदा सरकार ने डकैतों को तो खत्म कर दिया,एकाध बचे दस्यु गैंग भी निशाने पर हैं,जिन्हें जल्द ही मार गिराने का प्लान बनाया जा रहा है। लेकिन आजादी से आज तक पाठा की पेयजल समस्या का स्थाई समाधान कोई नहीं निकल पाया।
सरकारें और स्थानीय जनप्रतिनिधि बदलते रहे लेकिन आज तक भी पाठा के पेयजल समस्या को लेकर बिल्कुल भी चिंतन नहीं किया गया है। अब सवाल यह है की आखिर कौन पाठा की पेयजल समस्या कि स्थाई समाधान निकालेगा?  स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा कभी भी सदन मे पाठा के पेयजल का मुद्दा नहीं उठाया गया। जबकि बेवजह के मुद्दे उठे भी हैं। जबकि पाठा क्षेत्र की प्रमुख समस्या पेयजल संकट है हर बार चुनाव के समय पेयजल संकट का मुद्दा उठता तो है लेकिन चुनाव मे विजयी होने वाला प्रत्याशी इस गंभीर मुद्दे को भूल स जाता है।
एसे मे अब देखने वाली बात यह होगी की नवागंतुक जिलाधिकारी शुभ्रांत शुक्ला इस बेहद गंभीर समस्या का कोई स्थाई समाधान निकाल पाएंगे। क्यों शुभ्रांत शुक्ला बूहद इमानदारों मे शुमार आईएएस अफसर हैं। पाठावासियों को उम्मीद है कि जरुर कुछ न कुछ इस गंभीर समस्या का विकल्प निकालेंगे।
बरगढ पाठा की 19 व मानिकपुर की मानिकपुर पाठा की 30 पंचायतों मे मार्च महीने से अंतिम जून तक भीषण पेयजल किल्लत रहती है। मई-जून मे लोग जंगली चोहड़ों से अपनी प्यास बुझाते हैं। जहां मनुष्य जानवरों का जूंठा मटमैला पानी पीने को मजबूर हो जाते हैं। गर्मी के दिनों मे जलस्तर अधिक गहरा जाने से यह समस्या उत्पन्न हो जाती है।
जल संरक्षण की बात तो होती है लेकिन काम नहीं
सरकार जल संरक्षण की बात तो करती है लेकिन सही ढंग से जल संरक्षण की दिशा मे काम नहीं किया जा रहा है। अगर जल संरक्षण मे सही तरीके से काम किया जय तो काफी हद तक पानी की समस्या से निजात मिल सकती है। प्रथम बात तो यह इलाका ही पूरी तरह से शुष्क है,शुष्क होने का सबसे बड़ा कारण वर्षाजल को संरक्षित नहीं किया जाता। जलाशय नहीं हैं। यहां जलस्रोत तो इतने बढिया हैं कि एक महीने की बरसात मे विशाल बांध लबालब हो सकते हैं। एसे कई चंद्राकर पहाड़ जिन्हें आपस मे जोड़कर कम लागत मे बड़े बांध बनाए जा सकते हैं लेकिन इस तरफ आज तक किसी का ध्यान ही नहीं गया। वर्षाजल बेवजह बह जाता है। अगर इसी वर्षाजल को संरक्षित कर लिया जाय तो जलस्तर सुधरने के साथ ही किसानों के बंद भाग्य के ताले भी खुल जाएंगे। बंजर जमीन एक उपजाऊ जमीन बनकर यहां के किसानों को समृध्द कर देगी। जब यहां के लोग समृध्द होंगे तो अच्छी शिक्षा की ओर प्रेरित होकर अपने भविष्य को बनाने मे जुट जाएंगे। यहां की बेरोजगारी दूर होने के साथ डकैतों का पनपना भी बंद हो जाएगा।
चिंतन से समाधान निकला जा सकता है।
नहीं हैं रोजगार के साधन
पाठा क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है यहां रोजगार के साधन न होने से आदिवासी पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रहे हैं। जंगल से लकड़ी काटकर और पत्थर तोड़कर अपने परिवार का जीवनयापन करना इनकी दिनचर्या बन चुकी है। पलायन का भी यही मुख्य कारण है कि रोजगार न होने से 80 प्रतिशत पाठा के लोग मजदूरी करने के लिए बड़े शहर चले जाते हैं। त्यौहारों पर ही अपने घर वापस लौटते हैं।

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