Thursday, December 9, 2021
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असत्य पर सत्य की जीत का पर्व है ‘विजय दशमी’

जन एक्सप्रेस । विनीत सिन्हा
कानपुर नगर। दशहरा (विजयादशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को ‘विजयादशमी’ के नाम से जाना जाता है।
इस दिन लोग शस्त्र-पूजा करते हैं और नया कार्य प्रारम्भ करते हैं (जैसे अक्षर लेखन का आरम्भ, नया उद्योग आरम्भ, बीज बोना आदि)। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो कार्य आरम्भ किया जाता है उसमें विजय मिलती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।
नवरात्रि के दसवें दिन ही क्यों मनाते हैं विजयदशमी
नौ दिनों तक चलने वाले मां भवानी के पावन पर्व के बाद 10वें दिन विजयदशमी का पर्व आता है। इसे भी बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन ही विजयदशमी क्यों मनाई जाती है ? यह तो हम सभी जानते हैं कि शारदीय नवरात्र की शुरुआत भगवान राम ने की थी। भगवान राम ने समुद्र के किनारे अश्विन माह में मां दुर्गा के नवरूपों की पूजा शुरू की थी। इसमें चंडी पूजा सबसे खास थी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त करने की आकांक्षा लेकर 9 दिनों तक लगातार शक्ति की पूजा की थी। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर 9वें दिन जब मां भगवती ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया तब वह दसवें दिन लंका पहुंचकर उन्होंने रावण का वध किया। मान्?यता है क?ि तब से ही नवरात्रि पूजन के बाद दसवें दिन असत्य पर सत्य की जीत का पर्व विजय दशमी मनाया जाने लगा। लंका युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए ब्रह्माजी ने श्रीराम को चंडी देवी की पूजा की सलाह दी थी। उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा था कि चंडी देवी के पूजन में वह दुर्लभ एक सौ आठ नीलकमल का प्रयोग जरूर करें। वहीं दूसरी ओर रावण ने भी अमरत्व प्राप्ति के लिए चंडी मां की पूजा के लिए यज्ञ और पाठ का आयोजन किया। रावण को जब पता चला कि भगवान श्रीराम भी चंडी यज्ञ कर रहे हैं तो उसने अपनी माया से भगवान श्रीराम के पूजा में शामिल होने वाले नीलकमल में से एक नीलकमल गायब कर दिया। यह बात जब भगवान श्रीराम को पता चली तो भगवान को याद आया कि उन्हें भी लोग ‘कमलनयन नवकंच लोचन’ कहते हैं और ऐसा स्मरण कर उन्होंने अपने नयन को निकालने के लिए तलवार निकाल ली, तभी माता चंडी वहां प्रकट हुईं और कहा कि वह उनकी भक्ति से बेहद प्रसन्न हैं और उन्हें लंका पर विजय का आशीर्वाद दे दिया। कथा मिलती है कि रावण भी मां चंडी देवी को प्रसन्न करने के लिए विधिवत् उनकी पूजा कर रहा था। लेकिन पूजन के दौरान उसने सहस्र चंडी पाठ के प्रथम मंत्र ‘हरिणी’ शब्द को ‘हरिणी’ के बजाय ‘कारिणी’पढ़ा। इसमें ‘ह’ की जगह ‘क’ का उच्चारण करने से मंत्र का अर्थ बदल गया। इससे मां चंडी का यज्ञ सफल नहीं हो पाया और रावण मर्यादा पुरुषोत्म के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ।

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