
जन एक्सप्रेस /कौशांबी :- सरसवां ब्लॉक के अढ़ौली गांव स्थित माँ आनंदेश्वरी (आनंदी माता) मंदिर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शुमार है। यहां संतान प्राप्ति की कामना लेकर दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। खासकर नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि माता को भीगे चावल का भोग लगाने से सुहागिनों की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में भंडारे का आयोजन कराते हैं।
जिला मुख्यालय मंझनपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर राम वनगमन मार्ग से जुड़ा अढ़ौली गांव अपनी धार्मिक आस्था और प्राचीन मंदिर के लिए जाना जाता है। मंदिर में संतान की कामना रखने वाली महिलाएं माता को भीगे चावल का भोग लगाती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, भोग के दौरान माता के मुंह से निकला चावल यदि महिला के आंचल में गिर जाए तो उसकी गोद भर जाती है। इसी विश्वास के चलते नवरात्र में बड़ी संख्या में महिलाएं माता के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचती हैं।

खंडित प्रतिमाएं मिलने के बाद फिर गुलजार हुआ धाम – मंदिर के पुजारी जितेंद्र मिश्र, रवींद्र सिंह और धीरेंद्र सिंह के मुताबिक, ऐतिहासिक मंदिर को औरंगजेब के शासनकाल में नष्ट कर दिया गया था। बाद में मंदिर के समीप स्थित तालाब में देवी की खंडित प्रतिमाएं मिलीं। इसके बाद स्थानीय लोगों ने दोबारा मंदिर को स्थापित किया और धार्मिक गतिविधियां शुरू हुईं। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
शुभ कार्य से पहले माता के दर्शन की परंपरा – अढ़ौली और आसपास के क्षेत्रों में माँ आनंदी माता के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। स्थानीय लोग किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले माता के दर्शन करना शुभ मानते हैं। श्रद्धालु यहां मन्नत पूरी होने पर बधाई पूजने आते हैं और अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं। संतान प्राप्ति समेत अन्य मनोकामनाएं पूरी होने पर मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसी परंपरा के चलते मंदिर परिसर में सालभर धार्मिक आयोजन और भंडारे होते रहते हैं।
अढ़ौली का यह मंदिर धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन इतिहास और स्थानीय परंपराओं के संगम के रूप में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।






