
जन एक्सप्रेस /पिथौरागढ़ :- टीबी की शुरुआती पहचान को आसान, सुलभ और कम खर्चीला बनाने के लिए सांस में मौजूद रासायनिक यौगिकों के विश्लेषण पर आधारित नई सेंसर तकनीक विकसित करने की दिशा में शोध किया जा रहा है। इसी क्रम में मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी), प्रयागराज के सहायक प्रोफेसर डॉ. दीपक पुनेठा ने पिथौरागढ़ स्थित टीबी अस्पताल का दौरा कर चिकित्सकों से संवाद किया। उन्होंने टीबी के लक्षणों, वर्तमान जांच प्रक्रियाओं और रोग की समय पर पहचान में आने वाली चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा की।
डॉ. पुनेठा भारत सरकार की एएनआरएफ (ANRF) समर्थित MANTRA-TB परियोजना के तहत सांस में मौजूद विशिष्ट रासायनिक यौगिकों का विश्लेषण कर टीबी की शुरुआती पहचान के लिए पोर्टेबल, गैर-आक्रामक और कम लागत वाली प्रणाली विकसित करने पर कार्य कर रहे हैं। अस्पताल में डॉ. ललित भट्ट और डॉ. सागर चंद के साथ हुई चर्चा का उद्देश्य मरीजों की वास्तविक समस्याओं और चिकित्सा क्षेत्र की जरूरतों को समझकर अनुसंधान को व्यावहारिक दिशा देना था।
दुर्गम क्षेत्रों में जांच की सुविधा बढ़ाने पर जोर
चर्चा के दौरान डॉ. कौशिक ने ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने से जुड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोगों को जांच और उपचार के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जांच केंद्रों की सीमित उपलब्धता, विशेषज्ञ चिकित्सकों तक पहुंचने में कठिनाई तथा समय और आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण कई बार रोग की पहचान और उपचार प्रभावित होते हैं। ऐसे में सरल, सुलभ और कम लागत वाली जांच तकनीकें दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। इस दौरे के समन्वय और व्यवस्थाओं में भी डॉ. कौशिक का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
सफलता मिलने पर दूरस्थ क्षेत्रों को मिल सकता है लाभ
मुख्य चिकित्सा अधिकारी पिथौरागढ़ डॉ. जे.एस. चुफाल ने उम्मीद जताई कि यदि यह तकनीक सफलतापूर्वक विकसित होने के साथ चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित होती है, तो टीबी की शुरुआती पहचान को अधिक सुलभ बनाने में मदद मिल सकती है। इसका लाभ विशेष रूप से ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मिल सकता है, जहां समय पर जांच कराना कई बार चुनौतीपूर्ण होता है।
डॉ. पुनेठा ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य सेंसर तकनीक और चिकित्सा विज्ञान के समन्वय से ऐसे किफायती समाधान विकसित करना है, जो भविष्य में टीबी की शुरुआती पहचान की सुविधा दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाने में योगदान दे सकें। हालांकि, इस तकनीक की उपयोगिता इसकी सफलता, सटीकता और चिकित्सकीय परीक्षणों के परिणामों पर निर्भर करेगी।






