शर्मनाक! सड़क के इंतज़ार में चली गई जान
मजरा धौबहरा की त्रासदी—बीमार युवक को नहीं मिली समय पर मदद, जंगल-झाड़ झांकते पहुंचे कंधे पर शव ना एंबुलेंस पहुंची, ना प्रशासन जागा… अब लाश उठाने का जिम्मा भी उठाया गरीबों ने

जन एक्सप्रेस, चित्रकूट/उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में सिस्टम की लापरवाही और विकास की खोखली बातों की एक और जिंदा मिसाल देखने को मिली — जहां सिर्फ पांच किलोमीटर सड़क न होने की वजह से एक युवक की जान चली गई।घटना मानिकपुर ब्लॉक के चंद्रामारा ग्राम पंचायत के मजरा धौबहरा की है, जहां एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी, और युवक मोहित ने इलाज के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
ना सड़क, ना सुविधा — ‘जंगलराज’ में छूट रही सांसें
बीमार मोहित की हालत गंभीर थी, लेकिन गांव तक संपर्क मार्ग नहीं होने के कारण 108 एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंच सकी।
गांव वाले खुद उसे कंधे पर उठाकर झाड़ियों और कच्चे रास्तों से निकालने लगे, लेकिन रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। ग्रामीणों का आरोप है कि अगर समय पर एंबुलेंस पहुंच जाती, तो मोहित को बचाया जा सकता था।
गांव वालों का फूटा गुस्सा — ‘अब लाशों से सड़क पक्की करवाएंगे क्या?’
मोहित की मौत के बाद गांव में आक्रोश फूट पड़ा।
परिजनों ने शव को कंधे पर उठाकर पंचायत भवन तक पहुंचाया।
वहीं, ग्राम प्रधान से शव रखने को लेकर कहासुनी हो गई।
गांव वालों का कहना है:हम वोट देने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन जीने के हक के लिए नहीं? एक सड़क नहीं बना सके ये नेता, अफसर और विभाग!” किसकी ज़िम्मेदारी? अधिकारी बोले: ‘काल ही नहीं आई!’
108 एंबुलेंस के जिला कार्यक्रम प्रबंधक सोनेंद्र शुक्ला ने कहा कि हमें कोई कॉल नहीं मिली… हमारे पास जानकारी ही नहीं थी।”बीडीओ पवन सिंह ने पल्ला झाड़ते हुए कहा—मजरा धौबहरा जंगल क्षेत्र में है, इसलिए वन विभाग से अनुमति नहीं मिलती। यही वजह है कि सड़क नहीं बन पाई।”
ग्राम प्रधान जगमोहन बोले—
हमने कई बार कोशिश की, पर ये मजरा ओहन बांध के परिक्षेत्र और वन क्षेत्र में आता है।”सवाल ये है — क्या जंगल की पगडंडी पर ही लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है?लाखों की योजनाएं, फिर भी ‘मौत की सड़क’ नहीं बन पाईप्रधानमंत्री सड़क योजना, ग्रामीण विकास विभाग, वन विभाग, और जिला प्रशासन — सबके पास बजट है, योजनाएं हैं, पर मजरा धौबहरा आज भी 2025 में एक सड़क के लिए तरस रहा है।जनता का सवाल: कब खत्म होगा ‘सिस्टम’ का बहाना?हर बार कोई न कोई विभाग जिम्मेदारी से भागता है। हम लोगों को मरना है क्या, क्योंकि यहां जंगल है?”ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही सड़क निर्माण की ठोस कार्यवाही नहीं हुई, तो वे प्रशासनिक कार्यालयों के सामने धरना देंगे और शव रखकर प्रदर्शन करेंगे। ये केवल मोहित की मौत नहीं, ये उन हजारों गांवों की चीख है जहां ‘विकास’ अभी तक वोट तक ही सीमित है। क्या अफसर अब भी नींद में रहेंगे, या किसी और की सांस रुकने का इंतज़ार करेंगे?






