
जन एक्सप्रेस उत्तरकाशी:जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्परिणाम अब गंगा नदी और उसकी सहायक धाराओं पर स्पष्ट रूप से दिखने लगे हैं। गंगा विश्व धरोहर मंच के संयोजक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि गंगोत्री ग्लेशियर सहित अन्य हिम स्रोतों के तेज़ी से पिघलने के कारण नदियों के बहाव में अस्थायी बढ़ोतरी देखी जा रही है, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव जल प्रवाह में भारी गिरावट के रूप में सामने आएगा।
गंगा का प्रवाह बदलेगा, बाढ़ का खतरा बढ़ेगा
डॉ. नौटियाल के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते गंगा के बेसिन क्षेत्र में बहाव की दिशा और मात्रा दोनों में बदलाव हो रहा है। इससे बार-बार बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है। अत्यधिक वर्षा और बर्फ पिघलने से गंगा का जलस्तर अस्थाई रूप से बढ़ सकता है, लेकिन जब ग्लेशियरों का पिघलना थम जाएगा, तब नदियों में जल की भारी कमी आ जाएगी।
2090 तक बर्फ पिघलने में 57% की कमी का अनुमान
एक अध्ययन के मुताबिक, 21वीं सदी के अंत तक गंगा नदी के कुल प्रवाह में 50% तक वृद्धि हो सकती है, जिससे मैदानी इलाकों में भारी बाढ़ की आशंका है। हालांकि, 2090 तक ग्लेशियरों से बर्फ पिघलने की दर में 57% तक गिरावट आ सकती है, जिससे जल प्रवाह स्थायी रूप से घटेगा। गंगा, यमुना और अन्य नदियों में जलस्तर घटने से इन नदियों में रहने वाले जीव-जंतुओं पर गंभीर संकट आ सकता है। विशेष रूप से गंगा डॉल्फिन, कछुए और घड़ियाल जैसे जलीय जीवों के विलुप्त होने का खतरा गहरा गया है। तापमान में उतार-चढ़ाव और प्रदूषण से न केवल इन प्रजातियों का जीवन प्रभावित होगा, बल्कि नदी का पारिस्थितिकी तंत्र भी असंतुलित हो जाएगा। गंगा और उसकी सहायक नदियां उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के लिए पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत का प्रमुख स्रोत हैं। यदि जल स्तर में गिरावट आती है, तो स्वच्छ जल की आपूर्ति गड़बड़ा सकती है, जिससे कृषि, ऊर्जा और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है।






