परिसीमन के बाद गाजियाबाद जिलापंचायत की 3 सीटें होगी कम,अब

जन एक्सप्रेस : प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के बिगुल बजने से पूर्व जिला पंचायत राज विभाग द्वारा प्रस्तावित पुनर्गठन की सूची जारी करने के बाद गाजियाबाद की राजनीति गर्माने लगी है। परिसीमन में वार्डो की संख्या कम होने से भविष्य के राजनीतिक दावेदार खासे परेशान हो उठे है।
जिला पंचायत राज विभाग द्वारा पुनर्गठन की सूची जारी करने के बाद अब जिला पंचायत 14 की जगह 11 सदस्यों वाला ही रह जाएगा । विभागीय अधिकारी की माने तो जिला पंचायत के वार्ड सृजन मतदाताओं की संख्या पर होता है। 50 हजार मतदाताओं पर एक वार्ड का सृजन किया जाता है । वर्तमान में जनपद गाजियाबाद के जिला पंचायत क्षेत्र के मतदाताओं की संख्या लगभग 5.58 लाख है। जिसके सापेक्ष 11 वार्ड ही बनते हैं।
परिसीमन के बाद जिला पंचायत ही नहीं क्षेत्र पंचायत और गांव भी प्रभावित होंगे ।लेकिन इनकी संख्या काफी कम है। 142 ग्राम पंचायतों में से 135 यथावत और शेष 7 में।आंशिक परिसीमन चल रहा है। जिला पंचायत की तरह ही ब्लॉक प्रमुख चुनाव में बड़ी भूमिका निभाने वाले क्षेत्र पंचायत सदस्यों की भी संख्या अब घटी है । पुनर्गठन अगर सही रहा तो क्षेत्र पंचायत सदस्यों की संख्या भी 323 से घटकर 258 हो जायेगी।
आपत्तियां दर्ज करने की समय सीमा 2 अगस्त
जिला पंचायत राज अधिकारी प्रदीप द्विवेदी ने बताया कि विभागीय पुनर्गठन की प्रकाशित सूची पर 2 अगस्त तक आपत्तियों को दर्ज किया जाएगा । उसके बाद 5 से 10 अगस्त तक अंतिम सूची जारी कर दिया जाएगा । परिसीमन के बाद ग्रामीण इलाकों की राजनीति गरमाने लगी है। वर्षो से अपने अपने क्षेत्र में राजनीतिक सीढ़ी के इस महत्वपूर्ण पायदान पर चढ़ने के लिए बेताब युवाओं सहित बुजुर्गो को भी गहरा झटका लगा है। सीमाओं के परिवर्तन के बाद राजनीतिक गोटी भी गड़बड़ा गई है।
धन कुबेरों की हुई बल्ले बल्ले
जिला पंचायत सदस्यों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों की संख्या कम होने से उन धन कुबेरों की बांछे खिल गई हैं, जिनके भविष्य की राजनीति का आधार पैसा है। सबको पता है कि जिला पंचायत से लेकर ब्लाक प्रमुख चुनावों में कैसे कैसे हथकंडे और वाहनों के उपहार मिलते हैं। भारी खर्च वाला चुनाव अब कुछ हद तक ऐसे नेताओं के लिए सस्ता साबित होगा जिनके लिए पद ही सब कुछ है।
गाजियाबाद का औद्योगिक क्षेत्र होना और विकास योजनाओं में आ रहा अकूत पैसा अब जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुखों के पद वर्चस्व की राजनीति का शिकार होता जा रहा है। यह वर्चस्व कहां जाकर खत्म होगा यह कोई नहीं बता सकता । लेकिन पुनर्गठन की प्रक्रियाओं ने जरूर ऐसे नेताओं के कलेजे को ठंडक पहुंचाई है जो इन प्रमुख पदों को येन केन प्रकारेण अपने कब्जे में रखना चाहते हैं।






