बेटी की शादी के लिए जोड़ा था जीवन भर का पैसा, बैंक ने किया इनकार

जन एक्सप्रेस/लखनऊ: यह मामला सिर्फ एक खाते से गायब पैसों का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जो आम आदमी बैंकिंग सिस्टम पर करता है। जमीन बेचकर बेटी की शादी का सपना देखने वाले एक पिता ने अपनी जीवन भर की मेहनत की कमाई बैंक ऑफ बड़ौदा में सुरक्षित समझकर जमा कराई थी। लेकिन जब बेटी की शादी का समय आया और पैसों की जरूरत पड़ी, तो बैंक से मिला जवाब हैरान कर देने वाला था।
पीड़ित पिता के अनुसार, जब वह बैंक पहुंचे और अपने खाते से जमा राशि निकालने की बात कही, तो बैंक मैनेजर ने साफ शब्दों में कह दिया—
“आपके खाते में पैसा ही नहीं है।”
यह सुनते ही मानो जमीन खिसक गई। जिस बैंक को उन्होंने अपनी जमा पूंजी का सबसे सुरक्षित ठिकाना माना था, वहीं से उन्हें खाली हाथ लौटा दिया गया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा आखिर गया कहां, बल्कि यह है कि अगर बैंक में रखा पैसा भी सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी आखिर भरोसा किस पर करे?
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने कई बार बैंक अधिकारियों से संपर्क किया, आवेदन दिए, गुहार लगाई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला, समाधान नहीं। बेटी की शादी सिर पर है और परिवार मानसिक तनाव से गुजर रहा है। इस पूरे मामले ने न सिर्फ आर्थिक संकट खड़ा किया है, बल्कि सामाजिक और मानसिक पीड़ा भी बढ़ा दी है।
न्याय की उम्मीद लेकर पीड़ित परिवार आखिरकार भारतीय किसान मजदूर यूनियन दशहरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष यादव के पास पहुंचा। पूरे मामले को सुनने के बाद मनीष यादव ने इसे आम आदमी के साथ धोखा और बैंकिंग व्यवस्था की गंभीर लापरवाही बताया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की चिंता है जो अपनी मेहनत की कमाई बैंकों में सुरक्षित समझकर रखते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला, तो बुधवार को बैंक ऑफ बड़ौदा का घेराव किया जाएगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जरूरत पड़ी तो यूनियन धरना-प्रदर्शन से भी पीछे नहीं हटेगी। मनीष यादव ने कहा कि बैंक को यह जवाब देना होगा कि खाताधारक का पैसा आखिर कहां गया और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन है।
इस पूरे घटनाक्रम ने बैंकिंग सिस्टम की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे मामलों में समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आम लोगों का बैंकों पर से भरोसा उठ सकता है। यह मामला दर्शाता है कि डिजिटल और आधुनिक बैंकिंग के दौर में भी आम आदमी खुद को कितना असहाय महसूस करता है।
बेटी की शादी जैसे पवित्र अवसर पर पिता को इस तरह की परेशानी झेलनी पड़े, यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय है। अब यह लड़ाई सिर्फ एक खाते की रकम की नहीं रह गई है, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता, बैंक की जिम्मेदारी और आम नागरिक के अधिकारों की लड़ाई बन चुकी है।
फिलहाल पीड़ित परिवार को न्याय मिलने का इंतजार है और सभी की नजरें बैंक प्रशासन और जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।






