“स्वच्छता का दिखावा, गंदगी की भरमार!”
लखनऊ की सड़कों पर बजबजाता सच, सुशांत गोल्फ सिटी से उठती सड़ांध ने खोली सफाई पखवाड़े की पोल

जन एक्सप्रेस, लखनऊ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देशभर में ‘स्वच्छता पखवाड़ा’ का भव्य ऐलान हुआ, लेकिन राजधानी लखनऊ की गलियों से उठती दुर्गंध पूछ रही है — क्या ये अभियान सिर्फ कागज़ों तक सीमित है? सुशांत गोल्फ सिटी के बगीयामऊ स्थित होटल कंफर्ट के बगल में फैली गंदगी किसी शर्मनाक सच की तरह आंखों में चुभ रही है। सड़क किनारे कूड़े के अंबार, नालियों से बहती सड़ांध और मच्छरों की फौज ने लोगों का जीना बेहाल कर दिया है। मगर जिम्मेदार अफसरों को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा — वो शायद अब भी ‘स्वच्छ भारत’ के गुलाबी पोस्टर छपवाने में व्यस्त हैं।
‘स्वच्छता पर्व’ या सड़ांध का महोत्सव? आमजन परेशान, प्रशासन बेपरवाह!
पूरे लखनऊ में कई जगहों पर हालात बदतर हैं, लेकिन सुशांत गोल्फ सिटी जैसी पॉश कॉलोनियों तक अगर गंदगी से पट जाएं तो बाकी शहर की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। वहां रहने वाले लोग बीमारियों से जूझ रहे हैं, बच्चों को संक्रमण का खतरा है और राह चलते लोगों को नाक पर रुमाल रखना मजबूरी बन गई है। “यह रोड है या कचरा मार्ग?” – यही सवाल अब स्थानीय लोग बार-बार पूछ रहे हैं। टूटी सड़कों और खुले सीवेज के बीच ‘स्वच्छता ही सेवा’ जैसे सरकारी नारे अब खोखले और मज़ाक जैसे लगने लगे हैं।
कैमरों के सामने झाड़ू, असल ज़िंदगी में बदबू! ये कैसा अभियान?
नेताओं और अफसरों की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है — हाथ में झाड़ू, चेहरे पर मुस्कान और बैकग्राउंड में चमचमाती साफ-सफाई। लेकिन वहीं दूसरी तरफ शहर की असलियत अलग ही कहानी बयां कर रही है। जिन इलाकों में सचमुच सफाई की जरूरत है, वहां ना झाड़ू पहुंची, ना सफाईकर्मी। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है – क्या सफाई सिर्फ कैमरों के लिए होती है? क्या आम जनता सिर्फ वोट देने के लिए बनी है, जीने लायक माहौल देने के लिए नहीं? लखनऊ की जनता अब जवाब मांग रही है — और इस बार सिर्फ कागज़ी जवाबों से काम नहीं चलेगा।






