उत्तराखंडदेहरादून

सड़क पर झूल रही मौत, चाइनीज मांझे से फिर गई जान

प्रशासन की सुस्ती, लोगों की बेरुखी और कानून के नाम पर महज दिखावा

जन एक्सप्रेस ,देहरादून। उत्तराखंड के आसमान में पतंगों की जगह अब मौत झूल रही है। प्रशासन के लाख दावों के बावजूद प्रतिबंधित चाइनीज मांझा खुलेआम बिक रहा है और इसका शिकार आम जनता हो रही है। वसंत पंचमी पर कनखल में एक ड्राइवर की जान चली गई, जबकि कई अन्य घायल हुए। फिर भी हालात जस के तस हैं—ना पुलिस गंभीर, ना समाज संवेदनशील।हरिद्वार पुलिस ने बीते दिनों बड़ी कार्रवाई का दावा किया था, लेकिन त्योहार आते ही चाइनीज मांझा हर गली-मोहल्ले में धड़ल्ले से बिकता नजर आया। छतों पर पतंग उड़ाते बच्चे और युवाओं के हाथों में वही खतरनाक मांझा था, जिसने पहले भी कई ज़िंदगियों को निगल लिया है।

मुखबिर तंत्र मजबूत फिर भी नाकाम क्यों?

पुलिस के पास मजबूत खुफिया नेटवर्क है, फिर भी मांझे के सौदागर आजाद घूम रहे हैं। कार्रवाई केवल “एक दिन की रस्म अदायगी” तक सीमित रह गई। दुकानदारों ने मांझे को गुप्त ठिकानों पर छिपा दिया और पुलिस ने आंखें मूंद लीं।

समुदाय भी बना मूक दर्शक

चाइनीज मांझे की रोकथाम सामुदायिक पुलिसिंग और जन-जागरूकता से ही संभव है, लेकिन समाज की उदासीनता भी डरावनी तस्वीर पेश कर रही है। कनखल निवासी सुलेखचंद की दर्दनाक घटना इसका उदाहरण है।

“वीडियो बनाते रहे लोग, कोई मदद को नहीं आया”

घायल सुलेखचंद की मदद के लिए जब सौरभ वत्स ने लोगों से गुहार लगाई, तो अधिकांश राहगीर मोबाइल कैमरा निकालकर वीडियो बनाने में जुटे रहे। किसी ने न रुकने की ज़हमत उठाई और न ही मदद करने की।

सौरभ वत्स की आंखों में आंसू थे जब उन्होंने बताया,

अगर वक्त पर अस्पताल पहुंचा देते, तो शायद सुलेख बच जाता। लेकिन लोग तो वीडियो बनाने में मशगूल थे… कोई नहीं रुका।” आख़िरकार नगर निगम के मुख्य सफाई निरीक्षक श्रीकांत और उनके सहयोगी संजय शर्मा ही घायल को अस्पताल पहुंचा सके

पुलिस की अपील या औपचारिकता?

हरिद्वार पुलिस सोशल मीडिया पर जागरूकता अभियान चला रही है, लेकिन जमीन पर प्रभाव नज़र नहीं आता। नगर पुलिस अधीक्षक पंकज गैरोला ने बताया कि पुलिसकर्मियों को निर्देश दिए गए हैं कि चाइनीज मांझा दिखते ही जब्त कर नष्ट करें। लेकिन इस चेतावनी का असर दिखना अभी बाकी है।

अब सवाल उठता है: जिम्मेदार कौन?

क्या केवल दुकानदार दोषी हैं?

क्या प्रशासन ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई?

और क्या समाज ने एक घायल को मरता देखने के बावजूद इंसानियत की कसौटी पर खुद को खरा साबित किया? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक चाइनीज मांझा यूं ही मासूमों की जान लेता रहेगा—और प्रशासन, समाज, और सिस्टम एक-दूसरे की ओर उंगली उठाते रहेंगे।

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