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काग़ज़ों में विकास, ज़मीन पर प्यास! आकांक्षी जनपद चित्रकूट में ‘आठ साल बेमिसाल’ की पोल खोलते स्कूल

स्मार्ट क्लास के दावों के बीच बिना बिजली–पानी के चल रहे विद्यालय, बच्चे और रसोइया डेढ़ किलोमीटर दूर से ढो रहे पानी

जन एक्सप्रेस | चित्रकूट (मानिकपुर)हेमनारायण हेमू): जिस उत्तर प्रदेश में सरकार ‘आठ साल बेमिसाल’, हर घर जल और सौभाग्य योजना के जरिए गांव–गांव विकास का दावा कर रही है, उसी प्रदेश के आकांक्षी जनपद चित्रकूट की हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। काग़ज़ों में चमकती योजनाएं और ज़मीन पर बदहाल स्कूल—यही तस्वीर सामने आई है मानिकपुर ब्लॉक के पठारी इलाके रुक्मा संकुल से।प्रसिद्ध शायर आले अदम गोंडवी की पंक्तियां यहां सटीक बैठती हैं—“तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।”

नया स्कूल, लेकिन बुनियादी सुविधाएं गायब

ग्राम पंचायत ददरी माफी के मजरे घाटा कोलान में वर्ष 2022–23 में लाखों रुपये खर्च कर प्राथमिक विद्यालय की नई इमारत तो बना दी गई, प्रधानाध्यापक की तैनाती भी हुई, छात्रों की संख्या भी ठीक-ठाक है—लेकिन बिजली, पानी और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं।विद्यालय परिसर में ट्यूबवेल, रसोईघर और शौचालय बने जरूर हैं, लेकिन वे या तो खराब हैं या उपयोग लायक नहीं। कमरों में लगे पंखों में जंग लग चुकी है, बिजली के बोर्ड दम तोड़ चुके हैं और लाइन आने का इंतज़ार वर्षों से है।

डेढ़ किलोमीटर दूर से पानी ढोते बच्चे और रसोइया

विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक रामशिया बताते हैं,“स्कूल नया बन गया, लेकिन बच्चे पीने का पानी घर से लाते हैं। मध्यान्ह भोजन बनाने वाली रसोइया को भी एक किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है।”तीन साल से ट्यूबवेल सूखा पड़ा है। न जल जीवन मिशन की पाइपलाइन पहुंची, न नल लगाए गए। एक बार प्रधानाध्यापक ने अपने खर्च से दूर खंभे से तार खिंचवाकर बोर चालू कराया, लेकिन चोर तार काट ले गए। अगर बाउंड्री होती तो शायद चोरी न होती।

माड़ो बांध का डर, पढ़ाई से ज़्यादा सुरक्षा की चिंता

विद्यालय परिसर के बगल से माड़ो बांध लगा हुआ है। बिना बाउंड्री के स्कूल में शिक्षक की सबसे बड़ी चिंता पढ़ाई नहीं, बल्कि यह रहती है कि बच्चे पानी के लिए बांध की ओर न चले जाएं। किसी दुर्घटना की आशंका हर समय बनी रहती है।रुक्मा संकुल में यह अकेला मामला नहीं है।
प्राथमिक विद्यालय घाटा कोलान, पुराना बहिलपुरवा, और प्राथमिक विद्यालय कोलान बड़ी मड़ैयन—तीन ऐसे स्कूल हैं, जहां आज भी बिजली नहीं पहुंची है। ये स्कूल सरकारी दावों और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को मुंह चिढ़ा रहे हैं।जुलाई माह में ही बिजली विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संबंधित स्कूल के ढाई लाख रुपये से अधिक धनराशि दो साल से विभाग के पास जमा है और “जल्द ही” लाइन डाल दी जाएगी।
लेकिन पांच माह बीतने के बाद भी हालात जस के तस हैं।खंड शिक्षा अधिकारी मानिकपुर मिथलेश कुमार ने कहा—“व्यवस्थाएं जल्द दुरुस्त होंगी, बाउंड्री और सड़क ग्राम पंचायत के अधीन है।”

डीएम की बैठक में खुली पोल

विद्यालयों में बिजली न होने की सच्चाई तब खुलकर सामने आई जब जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने एक बैठक में स्कूलों की स्थिति पूछी। बेसिक शिक्षा विभाग ने स्वीकार किया कि जिले में 100 से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां आज भी बिजली नहीं है।गौरतलब है कि अकेले रुक्मा संकुल में 32 प्राइमरी और कंपोजिट विद्यालय हैं।जब सरकारी फाइलों में सब कुछ “ठीक” है, पुरस्कार मिल रहे हैं, अफसर स्मार्ट क्लास दिखाकर पीठ थपथपा रहे हैं—तो फिर चित्रकूट के इन बच्चों के हिस्से अंधेरा, प्यास और डर क्यों?यह सिर्फ एक संकुल या कुछ स्कूलों की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं के ज़मीनी सच पर खड़े होते सवाल हैं—
क्या विकास सिर्फ काग़ज़ों तक ही सीमित है?

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