उत्तरकाशी

उत्तरकाशी: बड़ाहाट में NOC खत्म होने के बाद भी धड़ल्ले से चल रहीं मांस की दुकानें, “धर्म नगरी” प्रस्ताव की उड़ रही धज्जियां!

जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: नगरपालिका परिषद बड़ाहाट क्षेत्र में मांस और बूचड़ व्यवसाय को लेकर एक गंभीर एवं चिंताजनक स्थिति सामने आई है। यह पूरा मामला सीधे तौर पर नियमों की अवहेलना और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।

31 मार्च को समाप्त हो चुकी है NOC की वैधता

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बड़ाहाट क्षेत्र में मांस/बूचड़ व्यवसाय हेतु जारी एनओसी (NOC) की वैधता दिनांक 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है। नियमानुसार, उक्त तिथि के पश्चात बिना वैध एनओसी के किसी भी प्रकार का व्यापार संचालन पूर्णतः अवैध हो जाता है। ऐसी स्थिति में संबंधित दुकानों को तत्काल प्रभाव से बंद कराते हुए आवश्यक दंडात्मक कार्यवाही (जिसमें सीलिंग की कार्रवाई भी शामिल है) की जानी अनिवार्य होती है।

नियमों को ठेंगा दिखाकर धड़ल्ले से चल रही हैं दुकानें

कड़े नियमों के बावजूद, नगरपालिका परिषद बड़ाहाट क्षेत्र में अनेक स्थानों पर मांस की दुकानें खुलेआम संचालित हो रही हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि नियमों का पालन सुनिश्चित कराने में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है।

‘धर्म नगरी’ के प्रस्ताव की घोर अनदेखी

मुख्य बिंदु: उल्लेखनीय है कि नगरपालिका परिषद बड़ाहाट द्वारा पूर्व में बोर्ड बैठक के माध्यम से क्षेत्र को “धर्म नगरी” घोषित किए जाने का प्रस्ताव भी विधिवत पारित किया जा चुका है।

ऐसे प्रस्ताव का मूल उद्देश्य क्षेत्र की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक मर्यादाओं को बनाए रखते हुए कुछ गतिविधियों पर नियंत्रण एवं आवश्यक प्रतिबंध सुनिश्चित करना होता है। इसके बावजूद इस प्रकार के व्यवसायों का बिना वैध अनुमति के संचालन यह दर्शाता है कि न केवल नियमों की अनदेखी हो रही है, बल्कि बोर्ड के निर्णयों को भी गंभीरता से लागू नहीं किया जा रहा है।

अधिशासी अधिकारी (EO) और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

इस पूरे प्रकरण में अधिशासी अधिकारी (EO) एवं संबंधित नगरपालिका कर्मचारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नियमों का कड़ाई से पालन कराना, लाइसेंस व्यवस्था की निगरानी करना तथा बोर्ड के निर्णयों को धरातल पर लागू करना उन्हीं की प्रमुख जिम्मेदारी है।

इसके बावजूद यदि 31 मार्च के पश्चात भी अवैध रूप से दुकानें संचालित हो रही हैं और उन्हें सील नहीं किया गया है, तो यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक निष्क्रियता एवं दायित्व निर्वहन में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

जनता पूछ रही सवाल: लापरवाही या मिलीभगत?

वर्तमान में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि:

  1. जब नियम पूरी तरह स्पष्ट हैं?

  2. एनओसी की समयसीमा समाप्त हो चुकी है?

  3. बोर्ड द्वारा “धर्म नगरी” प्रस्ताव पारित है?

तब ऐसी गतिविधियों पर नियंत्रण करने के बजाय संबंधित अधिकारियों द्वारा आवश्यक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर प्रशासनिक उदासीनता का कोई बड़ा उदाहरण—यह अब एक गंभीर जांच का विषय बन गया है।

हमारी अपील: जनहित में अपेक्षा की जाती है कि शासन-प्रशासन द्वारा इस पूरे प्रकरण का गंभीरता से संज्ञान लिया जाएगा। नियमों के अनुरूप त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी तथा लापरवाह अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाएगी, जिससे भविष्य में इस प्रकार की अराजक स्थिति उत्पन्न न हो।

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