
जन एक्सप्रेस उत्तरकाशी: जब देश आपदा के संकट में घिरता है, तब केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ भी मोर्चा संभालती हैं। हरिद्वार स्थित शांतिकुंज, अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय, ऐसी ही एक संस्था है जो आध्यात्मिक जागरण के साथ-साथ आपदा राहत, सामाजिक उत्थान और सेवा कार्यों में भी अग्रणी भूमिका निभा रही है।
संस्थापक आदर्शों से प्रेरित सेवा संकल्प
शांतिकुंज की स्थापना वर्ष 1971 में युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य और वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा द्वारा की गई थी। “हम सुधरेंगे – युग सुधरेगा” के संकल्प को लेकर इस संस्था ने लाखों लोगों को आत्म-परिष्कार, समाज सुधार और सेवा के मार्ग पर अग्रसर किया है।
देशभर की आपदाओं में सक्रिय भागीदारी
चाहे गुजरात भूकंप, ओडिशा चक्रवात, हरिद्वार-लक्सर बाढ़, या लालढांग और कनखल अग्निकांड हो — शांतिकुंज ने हर बार तत्परता से राहत कार्यों का नेतृत्व किया। केदारनाथ आपदा के समय न केवल भोजन के पैकेट भेजे गए, बल्कि हजारों प्रभावितों को प्रतिदिन भोजन भी उपलब्ध कराया गया।
उत्तरकाशी त्रासदी में फिर निभाई अग्रणी भूमिका
7 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी के धराली गाँव में आई भीषण आपदा के बाद, शांतिकुंज का विशेष राहत दल सबसे पहले वहाँ पहुँचा। श्री इंद्रजीत सिंह और दिनेश मैखुरी के नेतृत्व में भेजे गए 8 सदस्यीय दल ने दवाइयों, सूखा राशन, खाद्य सामग्री और राहत उपकरणों के साथ राहत अभियान शुरू किया। इस कार्य का समन्वय श्री योगेंद्र गिरी के निर्देशन में किया गया, जिसमें स्थानीय प्रशासन, सेना, एनडीआरएफ और अन्य संस्थाओं का सहयोग रहा।
देशभर में फैला सेवा नेटवर्क
शांतिकुंज ने भारत के प्रत्येक राज्य में आपदा राहत दल तैयार किए हैं, जो प्रशिक्षण प्राप्त स्वयंसेवकों से सुसज्जित हैं। इन्हें न केवल सेवा भावना, बल्कि मेडिकल सहायता, पुनर्वास, वितरण और आपात निर्णयों में भी दक्ष बनाया गया है।
अध्यात्म और सेवा का समन्वय
गायत्री परिवार यह सिद्ध करता है कि अध्यात्म केवल साधना तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और राष्ट्र के प्रति समर्पण भी उसका अभिन्न अंग हैं। संस्था की अधिष्ठात्री श्रद्धेया शैल बाला पंड्या, संरक्षक डॉ. प्रणव पंड्या और देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या के नेतृत्व में यह सेवा परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।
जरूरतमंदों के लिए सर्दियों में भी सेवा कार्य
हर वर्ष सर्दियों में कंबल वितरण, वस्त्र दान और भिक्षुकों, साधुओं व तीर्थयात्रियों की सहायता जैसे कार्यों में भी शांतिकुंज सबसे आगे रहता है। यहाँ पर दान किए गए वस्त्रों को व्यवस्थित तरीके से संग्रहित कर ज़रूरतमंदों तक पहुँचाया जाता है।






