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जो मुझे सच्चे मन से याद करता है मै उनके हृदय में सदा विद्यमान हूँ

भक्ति में दृढ़ निश्चय और प्रेम होने पर भगवान स्वयं आते है

जन एक्सप्रेस/चित्रकूट: श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान कथा कार्यक्रम बराह माफी में सोमवार को षष्ठम दिवस में आचार्य  रवि  महराज नयागांव आचारी आश्रम चित्रकूट ने कृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की कथा का रसपान कराया मुख्य श्रोता बलराम पाण्डेय व प्रभावती पाण्डेय समेत समस्त श्रोता भगवान के विवाह की कथा सुन भाव विभोर हो गए।
    भागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय २९ से ३३ तक की कथा को रसपंचाध्यायी कहा जाता है। इन पाँच अध्यायों में भगवान
कृष्ण और वृंदावन की गोपियों के मधुर प्रेम का दिव्य वर्णन है। यह भक्ति, प्रेम और आत्मा-परमात्मा के मिलन का प्रतीक मानी जाती है।
जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा चले गए, तो गोपियाँ और विशेषकर श्री राधा जी,उनके वियोग में अत्यंत व्याकुल रहने लगीं।
कृष्ण ने अपने मित्र और शिष्य उद्धव जी को वृंदावन भेजा ताकि वे गोपियों को ज्ञान समझाएँ और उनके विरह को शांत करें।
उद्धव जी ने जाकर गोपियों को भगवान का संदेश सुनाया कि “जो मुझे सच्चे मन से याद करते हैं, मैं उनके हृदय में सदा विद्यमान हूँ।”
परंतु गोपियों का उत्तर अत्यंत भावपूर्ण था  उन्होंने कहा,
“हमें उपदेश की नहीं, कृष्ण के दर्शन की आवश्यकता है। हमारा मन, हृदय, सब उन्हीं में विलीन है।”
उद्धव जी ने गोपियों के निर्मल प्रेम को देखकर कहा कि “मैं ब्रज की धूल के कणों के समान भी नहीं हूँ। गोपियों का प्रेम तो सच्चे भक्ति रस का आदर्श है।”
इस प्रकार उद्धव को परमज्ञान हुआ कि भगवान तक पहुँचने का श्रेष्ठ मार्ग निष्काम प्रेमभक्ति ही है।
भागवत के दशम स्कंध के अध्याय ५२ से ५४ में यह कथा आती है।
विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी अत्यंत रूपवती, सुशील और श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं।
उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया, जिसे रुक्मिणी नहीं चाहती थीं।
उन्होंने श्रीकृष्ण को एक प्रेम-पत्र भेजा जिसमें लिखा “हे प्रभु! यदि आप मुझे अपनी दासी मानते हैं तो विवाह मंडप में आने से पहले मुझे उठा ले जाइए।”
श्रीकृष्ण रथ लेकर विदर्भ पहुँचे। रुक्मिणी देवी ने मंदिर में जाकर देवी की पूजा की और जैसे ही बाहर आईं,श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ में बैठाया और सबके सामने ले गएरुक्मी ने पीछा किया,परंतु श्रीकृष्ण ने उसे पराजित कर दिया और रुक्मिणी से वैदिक विधि से विवाह किया।
यह कथा भक्त और भगवान के मिलन की प्रतीक है — जब भक्त एकनिष्ठ प्रेम से भगवान को पुकारता है,तो भगवान स्वयं आकर उसे स्वीकार करते हैं।
            उद्धव प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम ज्ञान से ऊपर है। रुक्मिणी विवाह दिखाता है कि भक्ति में दृढ़ निश्चय और प्रेम होने पर भगवान स्वयं आते हैं।
“भगवान तक पहुँचने का सर्वोत्तम मार्ग निष्काम प्रेमभक्ति है।”

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