महंगाई की मार, खटाई भी बनी गरीब की पहुँच से बाहर
कमर तोड़ महंगाई ने आम तो छोड़ा नहीं – अब खटाई पर भी चला चाकू

जन एक्सप्रेस/जौनपुर: मछलीशहर तहसील में इन दिनों बाजारें आमों से सजी हैं। पक्के आमों की बहार है, ठेले, दुकानें और गलियां आमों से गुलज़ार हैं। लेकिन इस आम सीज़न में भी गरीब की थाली में स्वाद की खटास नहीं, महंगाई की जलन घुल रही है।
अब खटाई खरीदना भी बना लग्ज़री काम!
मुंगराबादशाहपुर कस्बे में सरायडिंगुर गांव से आए देशी आमों से बाजार में खटाई की दुकानें चमक रही हैं, लेकिन कीमतें सुनकर ग्राहक दंग रह जा रहे हैं। खटाई की दर 200 से 250 रुपये प्रति किलो तक जा पहुंची है।
ग्रामीण क्षेत्रों की गृहिणियों ने तो अपने घरों में अचार-सिरका तैयार कर लिया, लेकिन जिनके पास आम का बाग नहीं, उन्हें सूखी खटाई की ऊंची कीमतें रुला रही हैं।
बिक्रेता बोले – मेहनत है जनाब, खटाई कोई खेल नहीं!
बिक्रेताओं का कहना है कि खटाई तैयार करना कोई आसान काम नहीं है।
आम खरीदना,
छीलना,
काटना,
धूप में सुखाना,
और फिर भंडारण
हर कदम पर मेहनत, लेबर और खर्च का बोझ है।
इसीलिए कीमत में भी तड़का लगाना मजबूरी बन गया है।
जनता का सवाल – अब क्या खटाई भी अमीरों के हिस्से की चीज़ हो गई?
क्या घर की रसोई से खटाई भी गायब हो जाएगी?
क्या हर साल महंगाई का यही हाल रहेगा?
आम का मौसम भी अब आम लोगों के लिए नहीं रहा?
जन एक्सप्रेस की ज़मीनी रिपोर्ट बाजार में रौनक है, लेकिन जेबें सूनी हैं!
जहां आमों की मिठास से बाजार सजे हैं, वहीं महंगाई की खटाई ने लोगों का स्वाद बिगाड़ दिया है।
ग्रामीणों की मांग –
स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा दिया जाए
गृहिणियों और ग्रामीण समूहों को खटाई तैयार करने के लिए सहायता मिले
न्यायसंगत दाम तय करने के लिए प्रशासन हस्तक्षेप करे
“अब तो खटाई भी देख कर मुंह नहीं बनाते – जेब पहले देख लेते हैं!”
जनता बोली – स्वाद चाहिए, सरकार कुछ तो करिए!
जन एक्सप्रेस का सवाल – “अब क्या खटाई पर भी टैक्स लगेगा?”






