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अवैध गिरफ्तारी पर न्यायिक हिरासत वैध नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

जन एक्सप्रेस /प्रतापगढ़: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभियुक्त की गिरफ्तारी विधि के अनुसार नहीं की गई है, तो मजिस्ट्रेट द्वारा उसे न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश भी वैध नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि अवैध गिरफ्तारी के आधार पर दी गई न्यायिक हिरासत कानून की दृष्टि में टिक नहीं सकती।

यह फैसला न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने प्रतापगढ़ निवासी याची द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार करते हुए सुनाया।

क्या है मामला?

याचिका में बताया गया कि प्रतापगढ़ जिले के कंधई थाने में दुराचार, पॉक्सो समेत अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि अभियुक्त ने वादी की 17 वर्षीय पुत्री को बहला-फुसलाकर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में ब्लैकमेल किया।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 28 जनवरी 2026 को याची को बयान देने के लिए थाने बुलाया गया था। आरोप है कि थाने पहुंचने पर उससे अरेस्ट मेमो पर हस्ताक्षर करा लिए गए और औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया। अगले दिन उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

अरेस्ट मेमो में नहीं दर्ज थे कारण

याचिका में यह प्रमुख तर्क रखा गया कि अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के कारणों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने इस पहलू की जांच किए बिना अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि यदि मजिस्ट्रेट ने रिमांड स्वीकार कर लिया है, तो गिरफ्तारी की प्रक्रिया में किसी प्रकार की त्रुटि होने पर भी उसे बाद में चुनौती नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने राज्य का तर्क किया खारिज

खंडपीठ ने राज्य सरकार के इस तर्क से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की वैधता एक मूलभूत अधिकार से जुड़ा प्रश्न है और यदि गिरफ्तारी ही कानून सम्मत नहीं है, तो उसके आधार पर दी गई न्यायिक हिरासत भी अवैध मानी जाएगी।

अदालत ने अभियुक्त की न्यायिक हिरासत को अवैध घोषित करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला पुलिस प्रक्रिया और अभियुक्तों के संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी प्रावधानों का पालन अनिवार्य है और किसी भी प्रकार की लापरवाही न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं पाएगी।

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