
जन एक्सप्रेस/हरिद्वार: हरिद्वार नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण यदि वर्तमान युग में कहीं देखने को मिलता है, तो वह हैं – माता भगवती देवी शर्मा। वे केवल एक पत्नी, माँ या संगठन की संरक्षिका ही नहीं थीं, बल्कि एक युग प्रवर्तक, एक आत्म-संयमी तपस्विनी और एक जागरूक नारी चेतना की मूर्त प्रतिमूर्ति थीं। उनका जीवन एक ऐसी जलती हुई अखंड दीपशिखा था, जिसने करोड़ों लोगों के जीवन में रोशनी और दिशा दी।
जीवन का प्रारंभ : सेवा और तपस्या का व्रत-
माताजी का जन्म वर्ष २० सितंबर १९२६ में आगरा नगर में श्री जशवंत राव जी के घर चौथी संतान के रूप में हुई थी। बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक क्रियाकलाप में निरत रहती थी। वर्ष 1943 में उनका विवाह युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के साथ हुआ। यह विवाह एक सामाजिक संबंध के साथ ही आत्मिक उद्देश्य की पूर्ति का एक माध्यम था। जब वे पहली बार अपने ससुराल पहुँचीं, तो उन्होंने पाया कि आचार्य श्री सादगी और तपश्चर्या में रत हैं। उसी क्षण उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि उनका जीवन भी उसी राह पर समर्पित रहेगा। जौ की रोटी और छाछ से शुरू हुआ जीवन, त्याग और तप का प्रतीक बन गया।
नारी होकर भी नायक बनीं –
माताजी का जीवन दिखने में एक सामान्य गृहिणी का था, परंतु उनके भीतर एक अद्वितीय संगठनकर्ता, कुशल मार्गदर्शिका और आध्यात्मिक नेतृत्त्व की शक्ति विद्यमान थी। जब आचार्य श्री देवात्मा हिमालय में तपस्या हेतु प्रवास पर गए, तो माताजी ने न केवल आश्रम का संचालन किया, बल्कि अखण्ड ज्योति जैसी पत्रिकाओं के संपादन, लेखन और पाठकों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी उठाई।
तब उन्होंने 13 पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से नारी जागरण, परिवार निर्माण, समाज सुधार और राष्ट्र सेवा जैसे विषयों पर अथक कार्य किया। उनका यह कार्य साहित्यिक और क्रंतिकारी था, जिसने जनमानस को झकझोरा।
नारी जागरण की क्रांति-
माताजी ने नारी को केवल घर की चारदीवारी से निकालकर उसे वेद-मंत्रों की स्वरधारा से जोड़ा। उन्होंने हजारों लाखों महिलाओं को वैदिक कर्मकाण्ड में प्रशिक्षित कर, उन्हें ब्रह्मवादिनी की भूमिका में प्रतिष्ठित किया। आज देश-विदेश में लाखों महिलाएँ यज्ञ, संस्कार और आध्यात्मिक आयोजनों का संचालन कर रही हैं, यह माताजी की दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम है।
अश्वमेध यज्ञ : समाज परिवर्तन की प्रयोगशाला-
जब सामाजिक विघटन का समय था, तब माताजी ने 26 अश्वमेध यज्ञों के माध्यम से एक नयी विचार क्रांति का शंखनाद किया। इन यज्ञों ने समाज को जाति, पंथ, वर्ग के भेद से ऊपर उठने की प्रेरणा दी। उन्होंने लोगों को एक मंच पर लाकर सद्भाव, समरसता और सेवा के मूल्यों से जोड़ा।
संगठन की धुरी-
आचार्य श्री के महाप्रयाण (२ जून 1990) के पश्चात संगठन को संभालना एक बड़ी चुनौती थी, परंतु माताजी ने असीम धैर्य और संतुलन का परिचय देते हुए संपूर्ण मिशन को बिखरने नहीं दिया। शरद पूर्णिमा 1990 को उन्होंने नए युग के शंखनाद की घोषणा करते हुए यह स्पष्ट किया – यह कार्य दैवी शक्ति द्वारा संचालित है, और यह अब कभी रुकने वाला नहीं। उनके नेतृत्व में शांतिकुंज केवल एक आश्रम, संस्थान ही नहीं, बल्कि एक युग निर्माण का तीर्थ बन गया।
एक युगद्रष्टा माँ-
माताजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि नारी चाहे, तो वह न केवल घर को सँवार सकती है, बल्कि समाज और राष्ट्र की भी दिशा बदल सकती है। उन्होंने माँ के रूप में स्नेह दिया, मार्गदर्शक के रूप में ज्ञान दिया और संगठनकर्ता के रूप में एक नया इतिहास रचा।






