उत्तराखंडहरिद्वार

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य: युग ऋषि, विचार क्रांति और गायत्री परिवार

जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एक महान भारतीय समाज सुधारक, दार्शनिक और अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक थे। उन्हें ‘युग ऋषि’ और ‘वेदमूर्ति’ के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से समाज में ‘विचार क्रांति’ का सूत्रपात किया।
उनका जन्म 20 सितंबर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के आंवलखेड़ा गांव में एक जमींदार ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
उनके पिता का नाम पंडित रूपकिशोर शर्मा और माता का नाम दानकुंवरी देवी था। बचपन से ही उनका मन अध्यात्म और समाज सेवा में अधिक रमता था। 15 वर्ष की आयु में उन्हें अपने गुरु (सर्वेश्वरानंद जी) का सूक्ष्म शरीर में दर्शन प्राप्त हुआ, जिन्होंने उन्हें महान आध्यात्मिक पथ का मार्ग दिखाया। उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए इस वैश्विक संस्था की स्थापना की, जिसके आज करोड़ों अनुयायी हैं। आचार्य जी ने जीवन के हर पहलू पर 3200 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने चारों वेदों, 108 उपनिषदों और अन्य पुराणों का सरल हिंदी में अनुवाद किया। 1971 में हरिद्वार में शांतिकुंज की स्थापना की, जो आज अध्यात्म और नैतिक जागरण का एक प्रमुख केंद्र ह वे एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी भी थे और कई बार जेल भी गए। उन्हें “मत्ता” उपनाम से भी जाना जाता था। उनका विवाह 1946 में भगवती देवी शर्मा (जिन्हें अनुयायी ‘माताजी’ कहते हैं) से हुआ था 2 जून 1990 को गायत्री जयंती के शुभ दिन उन्होंने हरिद्वार में अपनी भौतिक देह का त्याग कर दिया उनकी विचारधारा और कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए देव संस्कृति विश्वविद्यालय और अखिल विश्व गायत्री परिवार जैसे संस्थान निरंतर सारे विश्व में सेवाएं दे रहे हैं
श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन के कुछ प्रमुख और प्रेरक विचार (अनमोल वचन) नीचे दिए गए हैं:
जीवन का उद्देश्य: “इन्सान का जन्म केवल खाने-पीने और सोने के लिए नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कर्म करने और आत्म-कल्याण के लिए हुआ है।”
परिवर्तन का सूत्र: “हम बदलेंगे, युग बदलेगा। हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।
सच्ची सेवा: “दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें, जो आपको अपने लिए पसंद न हो।
प्रार्थना और पुरुषार्थ: “ईश्वर की भक्ति का अर्थ है—अपने भीतर देवत्व को जगाना और समाज के लिए उपयोगी बनना।
समय का महत्व: “समय ही जीवन है, जो इसे नष्ट करता है, वह अपने जीवन को ही नष्ट करता है।
सफलता का मार्ग: “सादा जीवन और उच्च विचार ही सुखी जीवन का आधार हैं।
आचार्य जी का मानना था कि “विचार क्रांति” के माध्यम से ही समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। उनके साहित्य और विचारों के बारे में अधिक जानने के लिए आप अखंड ज्योति या गायत्री शक्तिपीठ की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।
आचार्य श्रीराम शर्मा के शब्दों में, जीवन को सार्थक बनाने के लिए आचरण में परिवर्तन, सेवा, ईमानदारी, और वैज्ञानिक आध्यात्मिकता महत्वपूर्ण है; वे कहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जो परावलंबी न बनाए, प्रेम दूसरों की खुशी में अपनी खुशी देखना है, और प्रभावी उपदेश आचरण से दिए जाते हैं, तथा उन्होंने गायत्री परिवार के माध्यम से समाज में क्रांति लाने का कार्य किया, जिसमें उन्होंने सरल भाषा और व्यावहारिक ज्ञान से लोगों को प्रेरित किया, जिससे अनेक व्यसन मुक्ति और सुधार हुए। शिक्षा जो व्यक्ति को अहंकारी या धूर्त बनाए, वह अशिक्षा से भी बुरी है।
अपनी प्रसन्नता को दूसरों की प्रसन्नता में लीन कर देना ही प्रेम है।जो शिक्षा वाणी से नहीं, बल्कि अपने आचरण से दी जाती है, वही सार्थक होती है। विचारों, वचनों और कर्मों में सच्चाई और निष्ठा रखना ही ईमानदारी है, जिससे आत्म-संतोष मिलता है। जीवन का अर्थ समय है; समय व्यर्थ न गँवाएँ। जो सोचते हैं पर करते नहीं, और जो करते हैं पर सोचते नहीं, दोनों असफल होते हैं। उन्होंने आध्यात्मिकता को वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया, जिसके लिए ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की। उन्होंने गायत्री महाविद्या और अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना की, जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक पुनर्जागरण था। वे एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्होंने पेंशन लेने से इनकार कर दिया और उसे जन-कल्याण के कार्यों में दान कर दिया। आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने शब्दों और कार्यों से जीवन को अनुशासित, सेवाभावी और आध्यात्मिक बनाने पर जोर दिया, ताकि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके।

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