चित्रकूट में खामोश त्रासदी: ‘पलायन’ बना परिवारों के टूटने की वजह
गांव सूने, मां-बाप अकेले, अस्पताल ‘रिफ़रल सेंटर’— चित्रकूट में पलायन की अनसुनी पीड़ा

जन एक्सप्रेस चित्रकूट (हेमनारायण द्विवेदी): चित्रकूट, जो राम की तपोभूमि और सांस्कृतिक आस्था का केंद्र रहा है, आज एक ऐसी सामाजिक त्रासदी से जूझ रहा है, जिसकी चर्चा न तो सत्ता के गलियारों में होती है और न ही समाज के मंचों पर। यह त्रासदी है — ‘पलायन’ की, जो जिले के गांवों को वीरान और बुज़ुर्गों को बेसहारा बना रहा है।
बेटे बाहर, मां-बाप अकेले – किससे मांगे सहारा?
गांवों में अब भी सैकड़ों बुज़ुर्ग अपने बुढ़ापे में अकेले जीवन गुजार रहे हैं। जिन बेटों को उन्होंने पाल-पोसकर बड़ा किया, वे आज रोज़गार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। बुज़ुर्गों के लिए न तो देखभाल करने वाला कोई है, और न ही आपात स्थिति में मदद करने वाला।चित्रकूट के सरकारी अस्पताल ‘रिफ़रल सेंटर’ बनकर रह गए हैं — यानी इलाज नहीं, सिर्फ रेफर करने का काम।
खोह क्षेत्र की दर्दनाक घटना: लाश पड़ी रही लावारिस
कुछ समय पहले खोह क्षेत्र में एक वृद्ध महिला की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उनका बेटा बाहर नौकरी करता था। उनकी लाश पूरी रात पोस्टमार्टम हाउस में लावारिस पड़ी रही, कोई देखने वाला नहीं था। यह घटना सिर्फ एक उदाहरण नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलता और सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की गवाही है।
ममता मिश्रा प्रकरण: पलायन से जुड़ा आत्महत्या का मामला
ममता मिश्रा का मामला भी इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। उनके पति बाहर नौकरी करते थे। घरेलू प्रताड़ना, अकेलापन और सामाजिक उपेक्षा ने उन्हें इस हद तक तोड़ दिया कि उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया। सवाल यह है कि एक अकेली महिला की सहायता के लिए समाज और सिस्टम कहां था?
जातिगत राजनीति के पीछे दब गया असली मुद्दा
आरोप है कि चित्रकूट के जनप्रतिनिधि जातिगत समीकरणों और वोट बैंक की राजनीति में उलझे हुए हैं, जबकि पलायन जैसी सर्वसमाज से जुड़ी समस्या पर कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया है।यह समस्या सिर्फ किसी एक जाति की नहीं — ब्राह्मण, बनिया, दलित, OBC — हर वर्ग इसका शिकार है। गांव में अब वही लोग बचे हैं जो या तो बुज़ुर्ग हैं, या फिर मजबूरी में पीछे रह गए हैं।
सवर्ण आर्मी की अपील: राजनीति से ऊपर उठकर सोचें जनप्रतिनिधि
जिला अध्यक्ष, सवर्ण आर्मी भारत चित्रकूट, देवेंद्र द्विवेदी ने इस गंभीर समस्या पर चिंता जताते हुए पूर्व सांसद आर.के. सिंह पटेल, भैरव प्रसाद मिश्रा, आनंद शुक्ला, चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय और अशोक जाटव सहित सभी जनप्रतिनिधियों से पलायन के मुद्दे को प्राथमिकता देने की अपील की है।जब तक हम अपने युवाओं को गांव में रोज़गार और सुरक्षा नहीं देंगे, तब तक चित्रकूट का विकास सिर्फ नारों तक सीमित रहेगा।”
समाधान की दिशा में क्या हो सकता है?
चित्रकूट में स्थानीय स्तर पर स्वरोज़गार और उद्योग को बढ़ावा देने वाली योजनाएं लागू की जाएं
शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाए
युवाओं के लिए हुनर आधारित प्रशिक्षण (Skill Development) सेंटर खोले जाएं
महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए समुदाय आधारित सहायता समूह सक्रिय किए जाएं
अगर अभी नहीं चेते तो चित्रकूट के गांव सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएंगे… पलायन अब सिर्फ एक आर्थिक समस्या नहीं, यह एक सामाजिक आपदा बन चुकी है। अब वक्त है कि समाज और सिस्टम, दोनों मिलकर इसकी रोकथाम की दिशा में ठोस क़दम उठाएं।






