डकैतों की गोद में बैठी सियासत! सपा नेता ने ददुआ को बताया भगवान, जनता को माना कीड़ा-मकोड़ा!
शिवशंकर पटेल की ज़ुबान से निकला ज़हर – खूनी ददुआ बना धरती का रक्षक, मारे गए निर्दोष लोग कहलाए राक्षस!

जन एक्सप्रेस चित्रकूट/बांदा: जब पूरा देश अपराधमुक्त राजनीति की ओर बढ़ रहा है, तब उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से एक ऐसा बयान आया है जिसने लोकतंत्र की नींव तक हिला दी है। सपा सांसद कृष्णा देवी पटेल के पति और पूर्व मंत्री शिवशंकर सिंह पटेल ने दस्यु सम्राट ददुआ को ‘भगवान’, ‘धरती का रक्षक’ और ‘मसीहा’ बता दिया। भंडारे के मंच से गरजते हुए कहा – “ददुआ ने राक्षसों को मारा, और जो ददुआ को मारे वो खुद राक्षस हैं।”
क्या यही है समाजवादी सोच? जिस डकैत ने बुंदेलखंड को दशकों तक बंदूक के साए में रखा, अपहरण, फिरौती और हत्याओं से लोगों का चैन छीना – उसे मंच से महान बता देना केवल शर्मनाक नहीं, बल्कि खतरनाक है! यही नहीं, शिवशंकर पटेल ने परोक्ष रूप से ये भी स्वीकार कर लिया कि ददुआ का असर उनके राजनीतिक सफर की सीढ़ी रहा है। क्या इसलिए अब वो अपने ‘गॉडफादर’ को भगवान कह रहे हैं?
चित्रकूट मानिकपुर पाठा, सांसद गायब – लेकिन ददुआ का भंडारा नहीं छोड़ा!
कुछ ही दिन पहले चित्रकूट में भीषण बाढ़ ने तबाही मचाई। लोग घरों से बेघर हो गए, बच्चे भूखे सो गए, गरीबों की ज़िंदगी मलबे में दब गई – लेकिन सपा सांसद कृष्णा देवी पटेल और उनके पति का कोई अता-पता नहीं था। न राहत, न सांत्वना, न एक ट्वीट! मगर जब ददुआ की पुण्यतिथि आई, तो नेताजी फूलमाला लेकर हाजिर हो गए – कंधे उचकाते, गर्व से कहते दिखे – “ददुआ न्याय करता था!”
जनता पूछ रही है – क्या एक खूनी डकैत की पूजा ही सपा की असली विचारधारा है? क्या राजनीति का मतलब अब अपराधियों को देवता बताना है? ये वही ददुआ है, जिसके नाम से गांवों में माताएं बच्चों को डराया करती थीं, और आज उसके नाम पर कीर्तन-भंडारा हो रहा है?
गुंडों के टुकड़ों पर पले नेता, कैसे करेंगे विकास?
शिवशंकर पटेल का बयान साफ करता है कि जिनके आदर्श ही डकैत हैं, उनसे जनता को सिर्फ धोखा मिलेगा। ऐसे नेता विकास नहीं करते, विकास पर डकैती डालते हैं। आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरे प्रदेश से गुंडों और माफियाओं का सफाया कर रहे हैं, तब सपा नेता उन्हीं अपराधियों को ‘धरती का रक्षक’ कहकर महिमामंडित कर रहे हैं।
कितने निर्दोषों को ददुआ ने केवल इसलिए मारा क्योंकि उन्होंने वोट नहीं दिया, विरोध किया या उसके रास्ते में आए। उनका क्या? क्या अब लोकतंत्र में गोलियों से डराने वाला महान और वोट मांगने वाला मजाक बन जाएगा?
जनता से नहीं, सिर्फ वोट से मतलब!
शिवशंकर पटेल का यह बयान बता गया कि उनके लिए जनता सिर्फ एक ‘मतदाता संख्या’ है। उनकी तकलीफें, उनका दर्द, उनका जीवन – सबकुछ चुनाव जीतने के बाद बेमानी हो जाता है। लेकिन जब ददुआ की पुण्यतिथि आती है, तब पूरी श्रद्धा और साज-सज्जा के साथ नेता मंच पर सज जाते हैं।
आज वक्त है जनता के जागने का। जिन्हें अपने डकैत ‘भगवान’ लगते हैं, वे लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। अपराधियों की जयकार करने वाले कभी भी आम जनता के दर्द को नहीं समझ सकते।






