चित्रकूट

एक ऐसा गांव जहां आजादी के बाद से आदिवासी समाज शिक्षा से है वंचित

  • स्कूल ना होने से शिक्षा से कोसों दूर हैं आदिवासी बच्चे
  • ऐसे में कैसे पूरा होगा सरकार का सर्व शिक्षा अभियान का सपना ?

 

जन एक्सप्रेस संवाददाता | चित्रकूट 

शिक्षा सभी बच्चों का संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है। 6 से 14 साल की उम्र के हरेक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहे इसको लेकर सरकार सर्व शिक्षा अभियान चलाकर सभी समुदायों एवं वर्गों को सन्तोषप्रद गुणवत्तापूर्ण, उपयोगी एवं प्रासंगिक शिक्षा उपलब्ध कराने का अभियान चला रही है। जिससे कि 6 से 14 वर्ष तक का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। लेकिन चित्रकूट जिले का एक ऐसा आदिवासी गांव जहां बच्चों के पढ़ाई के लिए स्कूल न होने से आज भी शिक्षा से वंचित हैं।

मानिकपुर क्षेत्र के गढचपा ग्राम पंचायत अंतर्गत बड़े हार पुरवा विकास से कोसों दूर है। यहां के लोगों के आवागमन के लिए न सुगम मार्ग है, नाहि बच्चों के पढ़ाई के लिए स्कूल ही है। सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा यहां के लोग जानते ही नहीं। सरकार की हर आपातकालीन सेवा यहां फेल है। केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाएं यहां दम तोड़ रही हैं। सबसे गंभीर विषय तो यहां के बच्चों के पढ़ाई के लिए स्कूल न होने से लोग निरक्षरता के अंधकार में डूबे हैं। जंगल के वनोपज से अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि बड़े हार पुरवा से स्कूल की दूरी तकरीबन 7 से 8 किलोमीटर दूर पतेरिया गांव है। जिससे नन्हे-मुन्ने बच्चे स्कूल जाने में असमर्थ हैं। अब सवाल यह है कि, क्या जिला प्रशासन नन्हे-मुन्ने बच्चों को शिक्षा दिला पाएगा या फिर वही ढाक के तीन पात बनकर रह जाएगा?

सरकार की जन कल्याणकारी योजनाएं तोड़ रहीं दम

ग्राम पंचायत गढचपा मजरा बडेहार का पुरवा सरकारी सिस्टम और सियासत की अनदेखी का जीता जागता उदाहरण है। मौजूदा समय मे इस गांव में 35 आदिवासी परिवार निवासरत हैं, लेकिन सम्पर्क मार्ग न होने के कारण न तो इनके पास शिक्षा व्यवस्था पहुंच सकी और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही अन्य किसी तरह की मूलभूत सुविधाएं ही। सैकड़ों कोल आदिवासी समाज के लोग शिक्षा से दूर है। आजादी के बाद से यहां के लोग अशिक्षा का दंश झेल रहे हैं। क्योंकि गांव में स्कूल ना होने से बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। कुल मिलाकर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं यहां दम तोड़ती दिख रही हैं।

 

आवागमन के लिए नहीं है सुगम रास्ता

पहाड़ों के बीच में बसा है बड़े हार का पुरवा के ग्रामीणों के आनेजाने के लिए रास्ता न होने से लोगों को जंगल के पथरीले ऊबड़खाबड़ रास्ता तय कर बड़े कठिनाई से गुजरना होता है। बड़े हार के ग्रामीणों ने कहा कि गांव से स्कूल की दूरी लगभग 7 किलोमीटर है। यहां पांच किमी का जंगली रास्ता है। जिस रास्ते से आनेजाने में जंगली जानवरों समेत बदमाशों का हमेशा भय बना रहता है। जिससे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। आजादी के बाद से अब तक चौथी पीढ़ी स्कूल नहीं गई। ऐसे में सर्व शिक्षा अभियान का सपना कैसे पूरा होगा ? यह सबसे बड़ा प्रश्न।

बड़ेहार की समस्या से भलीभांति वाकिफ हैं जिम्मेदार

इस गांव की समस्या किसी से छिपी नहीं है। जिला प्रशासन व जनप्रतिनिधियो से भी यह समस्या से भलीभांति वाकिफ हैं। यहां की समस्याएं हमेशा अखबारों में सुर्खियां बटोरती हैं।बल्कि इस पर प्रशासनिक स्तर पर कई बार चर्चा हुई है लेकिन यहां की समस्या का हल निकालने आज तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं। आज भी स्थिति जब की तस है।

कृष्णा कोल ने बयां किया अपना दर्द

कृष्णा कोल ने कहा कि ‘ दादू अब मरय कय उम्र होई गय गांव का विकास देखय का आंखी तरस गईं ‘ यह बात बड़ेहार निवासी बेहद बुजुर्ग कृष्णा कोल कह रहे हैं। कृष्णा कोल बताते हैं कि सबसे पहले इस स्थान पर बसने मैं आया था। कृष्णा कोल जब गांव आए तो धीरे -धीरे लोग बसते चले गए। बस तो गए लोग लेकिन पेयजल का भारी संकट था, तब कृष्णा कोल एक कुआं खोदने की योजना बनाई और जुट गए तब लोगों के सहयोग से तकरीबन 20 फिट गहरा कुआं खोदने में सफलता पाई और बड़ेहार की पेयजल की समस्या दूर हो गई। कृष्णा कोल को बुंदेलखंड का दशरथ मांझी की उमपा दी जाती है। इस मामले की जानकारी जब जिला प्रशासन को हुई तो तत्कालीन जिलाधिकारी शेषमणि पाण्डेय ने कृष्णा कोल को सम्मानित कर कुआं का जीर्णोद्धार कराने का आश्वासन दिया था, लेकिन आज कुएं की स्थिति यह कि कुआं पूरी तरह से पूर (भठ)गया है। कृष्णा कोल को इस बात का बहुत बड़ा दुख है। डीएम स्कूल खोलने का भी वादा किया था। कहा था बडे़हार के बच्चे अब अनपढ़ नहीं रहेंगे। अब वह पढ़ लिखकर अफसर बनेंगे। लेकिन यह समस्या सिर्फ वादा ही बन रह गई।

कहां है एनजीओ ?

पाठा क्षेत्र के विकास को लेकर कई एनजीओ चलाने जा रहे हैं, लेकिन किसी समाजसेवी संस्थान की नज़र गढचपा के बड़ेहार पुरवा तरफ जा रही। कई संस्थाएं जो शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी समस्याएं दूर करने के क्षेत्र में काम कर रही हैं। लेकिन बड़े हार का पुरवा में अभी तक किसी भी एनजीओ द्वारा विकास को लेकर तनिक भी कोई कार्य नहीं किया गया। आदिवासियों के लिए विशेष रूप से कार्य कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि, आखिरकार वह एनजीओ कहा गायब हैं ?

 

जन एक्सप्रेस संवाददाता ने इस संबंध में जब एबीएसए मानिकपुर मिथिलेश कुमार से बात की तो उन्होंने कहा कि आपके द्वारा यह मामला संज्ञान में आया है। वहां का सर्वे कराकर जल्द ही जल्द ही स्कूल बनवाए जाने की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button