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नगर पालिका जौनपुर की लापरवाही से जनता बेहाल, जन्म–मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना बना सालों का इंतज़ार

जन एक्सप्रेस/जौनपुर: जौनपुर नगर पालिका परिषद की कार्यप्रणाली इन दिनों आम जनता के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे अत्यंत आवश्यक सरकारी दस्तावेज़ बनवाना अब लोगों के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं रह गया है। स्थिति यह है कि जिन प्रमाण पत्रों को नियमानुसार कुछ ही दिनों में मिल जाना चाहिए, उनके लिए नागरिकों को एक से डेढ़ साल तक इंतज़ार करना पड़ रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पालिका में फाइलें महीनों तक एक टेबल से दूसरी टेबल तक घूमती रहती हैं, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ता। कई मामलों में तो आवेदन की फाइलें रहस्यमय तरीके से “गायब” हो जाती हैं, जिसके बाद पीड़ितों को फिर से पूरी प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

नियमों के अनुसार जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र से जुड़े मामलों में एसडीएम कार्यालय से 10 दिनों के भीतर जांच आख्या प्राप्त होनी चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। रिपोर्ट आने में दो से तीन महीने तक का समय लग रहा है। सफाई निरीक्षकों द्वारा समय से मौके पर जाकर गवाही न लेने के कारण फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं और आवेदक लगातार परेशान हो रहे हैं।

नगर पालिका और एसडीएम कार्यालय के चक्कर काटते-काटते आम नागरिक मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुके हैं। बार-बार पूछने पर भी उन्हें न तो कोई स्पष्ट जवाब मिलता है और न ही समस्या के समाधान की कोई ठोस समय-सीमा बताई जाती है। बाबू स्तर पर आए दिन किसी न किसी बहाने से फाइलें रिजेक्ट कर दी जाती हैं।

कभी “सर्वर डाउन” होने का बहाना, तो कभी “आवेदन अधिक होने” की दलील — इस तरह की बहानेबाजी अब आम बात हो चुकी है। लोगों का कहना है कि अगर गलती बताई जाए तो उसे सुधारा जा सके, लेकिन यहां तो बिना स्पष्ट कारण बताए ही फाइल लौटा दी जाती है।

जन्म प्रमाण पत्र न बनने का सबसे ज्यादा असर नवजात बच्चों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है। प्रमाण पत्र के अभाव में बच्चों का आधार कार्ड नहीं बन पा रहा, स्कूलों में समय से दाखिला नहीं हो पा रहा और वे सरकारी योजनाओं के लाभ से भी वंचित रह जा रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर, मृत्यु प्रमाण पत्र न मिलने से परिजनों को विधवा पेंशन, बैंक खाते से संबंधित कार्य, बीमा क्लेम और संपत्ति के कागजी काम पूरे करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई परिवार ऐसे हैं जो महीनों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई मामलों में फाइनल रिपोर्ट पूरी होने के बावजूद प्रमाण पत्र प्रिंट नहीं किए जा रहे। लोग रोज़ाना नगर पालिका पहुंचते हैं, लेकिन कभी “आज साहब नहीं हैं” तो कभी “कल आइए” कहकर लौटा दिया जाता है।

कई नागरिकों का कहना है कि बार-बार अपमान और टालमटोल के कारण उनका धैर्य अब जवाब दे रहा है। पूर्व में कर्मचारियों द्वारा एसआईआर प्रक्रिया में व्यस्त होने का हवाला देकर देरी को सही ठहराया गया, लेकिन उसके बाद भी काम में कोई तेजी नहीं आई।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जौनपुर की जनता आखिर कब तक इस लापरवाही की कीमत चुकाती रहेगी? नगर पालिका की यह उदासीनता कब खत्म होगी और कब आम नागरिकों को उनके अधिकार के दस्तावेज़ समय पर मिल पाएंगे?

यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के मौलिक अधिकारों के साथ खुला खिलवाड़ है। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर समस्या का संज्ञान लें और व्यवस्था में सुधार करें, ताकि आम आदमी को राहत मिल सके।
कर्मचारी मस्त हैं और जनता त्रस्त।

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