डीजीपी मुख्यालय के सामने ‘जीरो टॉलरेंस’ बेबस! लखनऊ में अतिक्रमण का खुला खेल
112, मातृ-शिशु अस्पताल और पुलिस मुख्यालय के सामने जाम ही जाम, नगर निगम पर गंभीर सवाल

जन एक्सप्रेस/लखनऊ।एक तरफ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती है, वहीं राजधानी लखनऊ में कानून और प्रशासन की नाक के नीचे अतिक्रमण चरम सीमा पर पहुंच चुका है।हैरानी की बात यह है कि यह हालात डीजीपी मुख्यालय, 112 कार्यालय और मातृ-शिशु अस्पताल के ठीक सामने देखने को मिल रहे हैं।मातृ-शिशु अस्पताल के सामने सड़क पर ठेलिया और रेड़ी की भरमार के चलते लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है।स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार एम्बुलेंस और मरीजों के वाहन तक जाम में फंस जाते हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे हैं।
“नगर निगम को पैसा देते हैं” — ठेलिया वालों का चौंकाने वाला दावा
सड़क पर अतिक्रमण कर रहे ठेलिया-रेड़ी संचालकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि“हम नगर निगम को पैसा देते हैं, इसलिए हमें कोई हटाने नहीं आता।”यह बयान अपने आप में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
कागजों में सख्ती, जमीन पर वसूली?
नगर निगम एक ओर दावा करता है कि“सड़कों पर अतिक्रमण किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा,”लेकिन हकीकत यह है कि अतिक्रमण जस का तस है जाम रोज़ाना लग रहा है कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित दिखती है सूत्रों के मुताबिक नगर निगम द्वारा ठेलिया-रेड़ी वालों से मोटी रकम वसूली जाती है कुछ पैसा सरकारी खाते में जमा कर खानापूर्ति की जाती है बाकी रकम निजी जेबों में जाने के आरोप हैं
सबसे बड़ा सवाल—क्या चंद रुपयों की रसीद काट लेने से सड़क घेरने का गुनाह माफ हो जाता है? डीजीपी मुख्यालय के सामने भी नहीं दिखता अतिक्रमण!जिस सड़क पर डीजीपी मुख्यालय है 112 सेवा का दफ्तर है अधिकारियों का रोज़ाना आना-जाना है वहीं अगर अतिक्रमण नहीं दिख रहा, तो सवाल उठता है— क्या नगर निगम की आंखों पर पैसे का चश्मा चढ़ा है? लखनऊ नगर निगम भ्रष्टाचार के आरोपों में पहले से घिरा लखनऊ नगर निगम पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सुर्खियों में रहा है। ताजा हालात ने एक बार फिर निगम के दावों की पोल खोल दी है।
सरकार को गुमराह करने का फार्मूला?
यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या यह सब ऊपर तक गुमराह करने की रणनीति है? क्या विकास की जगह सिर्फ वसूली मॉडल पर काम हो रहा है?
जिम्मेदार कौन? जवाबदेही कब? अब सवाल सिर्फ अतिक्रमण का नहीं, बल्कि कानून के सम्मान का प्रशासनिक इच्छाशक्ति का और जीरो टॉलरेंस की सच्चाई का है क्या योगी सरकार के दावे लखनऊ में ही दम तोड़ रहे हैं? या फिर नगर निगम के लिए विकास से ज्यादा वसूली प्राथमिकता बन चुकी है?






