रोडवेज की वीआईपी सीटें बनीं “लोकतंत्र का म्यूजियम”, जनता पूछ रही — नेता आखिर बसों से गायब क्यों?
पेट्रोल बचाने का संदेश जनता के लिए, लेकिन नेताओं की आरक्षित सीटें आज भी खाली!

जन एक्सप्रेस/लखनऊ।( हेमनारायण हेमू) :देशभर में एक ओर पेट्रोल-डीजल बचाने, प्रदूषण कम करने और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की मुहिम तेज़ी से चलाई जा रही है। सरकार जनता से बसों, ट्रेनों और साझा वाहनों का इस्तेमाल करने की अपील कर रही है। लेकिन दूसरी ओर रोडवेज बसों में आज भी “विधायक”, “सांसद” और “मंत्री” के नाम से आरक्षित सीटें लोकतंत्र की एक ऐसी तस्वीर पेश कर रही हैं, जो अब सिर्फ बोर्डों तक सीमित होकर रह गई है। बसों में चमचमाते अक्षरों में लिखी वीआईपी सीटें अक्सर खाली दिखाई देती हैं। आम यात्री धक्के खाते रहते हैं, महिलाएं और बुजुर्ग खड़े होकर सफर करते हैं, लेकिन नेताओं के लिए आरक्षित सीटें मानो किसी “विशेष मेहमान” का इंतजार करती रहती हैं। जनता अब सवाल पूछ रही है कि जब नेता खुद सार्वजनिक परिवहन से सफर नहीं करते, तो फिर इन सीटों को ढोने का क्या औचित्य बचता है?
हाल ही में कुछ नेताओं के टोटो, ई-रिक्शा और साधारण वाहनों से सफर करने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। किसी ने इसे सादगी बताया, तो किसी ने चुनावी स्टंट कहकर तंज कसा। लेकिन इस बहस के बीच एक सवाल फिर से ज़िंदा हो गया — आखिर रोडवेज की वीआईपी सीटों पर आखिरी बार कोई विधायक या सांसद कब बैठा था? दरअसल, यह व्यवस्था कभी लोकतंत्र को जमीन से जोड़ने के उद्देश्य से बनाई गई थी। मंशा थी कि जनप्रतिनिधि आम लोगों के बीच सफर करेंगे, बसों की भीड़ देखेंगे, टूटी सीटों का दर्द महसूस करेंगे और जनता की परेशानियों को करीब से समझेंगे। लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदल गई। नेताओं का सफर अब रोडवेज बसों से निकलकर एसी गाड़ियों, सुरक्षा घेरे और लंबे काफिलों तक पहुंच चुका है। यात्रियों का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना चाहती है, तो नेताओं को भी महीने में कुछ दिन रोडवेज बसों से सफर करना चाहिए। इससे जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी कम होगी और व्यवस्था की असलियत भी सामने आएगी। सोशल मीडिया पर लोग तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कोई कह रहा है — “नेता बस की सीट पर नहीं, अब सिर्फ पोस्टर और भाषणों में दिखाई देते हैं।” वहीं कुछ लोगों ने तंज कसते हुए लिखा — “रोडवेज की वीआईपी सीटें अब लोकतंत्र की सबसे शांत और सबसे खाली जगह बन चुकी हैं।” अब बड़ा सवाल यही है — क्या ये सीटें सिर्फ दिखावे के लिए बची हैं, या फिर कभी ऐसा दौर लौटेगा जब नेता सच में जनता के साथ बस में सफर करते नजर आएंगे?






