बहराइच: दबंगों की जागीर बना सरकारी पंचायत भवन, तिरंगे के अपमान पर भी प्रशासन मौन

जन एक्सप्रेस/बहराइच: सूर्य प्रकाश मिश्र उत्तर प्रदेश सरकार गांवों के कायाकल्प के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, लेकिन बहराइच के विशेश्वरगंज विकासखंड में जमीनी हकीकत इसके उलट है। यहाँ सरकारी संपत्तियां ग्रामीणों के काम आने के बजाय दबंगों के निजी इस्तेमाल का अड्डा बन गई हैं। विकासखंड के बड़ा गांव में बना पंचायत भवन आज खुलेआम अवैध कब्जे की भेंट चढ़ चुका है, और जिम्मेदार अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
पंचायत भवन पर कब्जा: ग्रामीणों के हक पर डाका
जिस पंचायत भवन का निर्माण ग्रामीणों की बैठकों, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और विकास कार्यों के लिए किया गया था, वह आज पूरी तरह ठप पड़ा है। मौके पर राम चंदर बाबा के परिवार का कब्जा है।
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कब्जेदारों का तर्क: परिवार का दावा है कि पंचायत भवन उनकी निजी जमीन पर बनवा दिया गया है, इसलिए वे इस पर काबिज हैं।
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प्रशासनिक विफलता: सबसे हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर मामले पर खंड विकास अधिकारी (BDO) का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। यह बयान अधिकारियों की संवेदनहीनता और ड्यूटी के प्रति लापरवाही को साफ दर्शाता है।
जमुनहा कला: राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान
लापरवाही का यह खेल यहीं नहीं रुकता। इसी क्षेत्र के ग्राम पंचायत जमुनहा कला में राष्ट्रभक्ति के दावों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
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नियमों का उल्लंघन: ‘अमृत महोत्सव’ के दौरान फहराया गया तिरंगा आज तक पंचायत भवन पर लहरा रहा है। भारतीय ध्वज संहिता (Flag Code of India) के नियमों के अनुसार सूर्यास्त के बाद या कार्यक्रम समापन पर तिरंगे को ससम्मान उतार लिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ महीनों से फटा-पुराना तिरंगा अधिकारियों और ग्राम प्रधान की उदासीनता की कहानी बयां कर रहा है।
उठते गंभीर सवाल: आखिर जिम्मेदार कौन?
सरकारी भवनों पर कब्जा और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कई बड़े सवाल खड़े करता है:
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क्या ग्राम विकास अधिकारी और BDO को अपनी सीमाओं में हो रहे इन अवैध कार्यों की वाकई खबर नहीं है?
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क्या दबंगों को स्थानीय सफेदपोशों या अधिकारियों का मौन संरक्षण प्राप्त है?
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सरकारी धन से बनी बिल्डिंग अगर ग्रामीणों के काम नहीं आ रही, तो इसकी वसूली किससे होगी?
ग्रामीण अब खुले आसमान के नीचे अपने काम कराने को मजबूर हैं, जबकि सिस्टम गहरी नींद में सोया है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस रिपोर्ट के बाद जागता है या ‘बड़ा गांव’ के ग्रामीण यूँ ही भटकते रहेंगे।






