
जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: देश की जीवनदायिनी गंगा को स्वच्छ बनाने के निरंतर प्रयासों के बावजूद प्रदूषण की समस्या अभी भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है। विभिन्न आकलनों के अनुसार कई स्थानों पर जल गुणवत्ता अब भी मानकों से नीचे बनी हुई है, जो चिंता का विषय है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि गंगा के कई हिस्सों में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग का स्तर अधिक है, जो जल में बढ़ते जैविक प्रदूषण का संकेत देता है। साथ ही फीकल कोलीफॉर्म की अधिकता यह दर्शाती है कि सीवेज का प्रवाह अभी भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाया है।
नगरों का अनुपचारित मल-जल, औद्योगिक अपशिष्ट और घाटों पर फैलता ठोस कचरा—ये सभी मिलकर गंगा की निर्मलता को प्रभावित कर रहे हैं। धार्मिक आस्थाओं के बीच पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी भी इस संकट को और गहरा करती है।
नमामि गंगे जैसे प्रयासों ने स्थिति में कुछ सुधार के संकेत अवश्य दिए हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थायी समाधान के लिए योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ जनसहभागिता अनिवार्य है।
गंगा विश्व धरोहर मंच के संयोजक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल के अनुसार, गंगा केवल नदी नहीं, जीवन का प्रवाह है। इसकी स्वच्छता तभी संभव है जब समाज और व्यवस्था दोनों मिलकर जिम्मेदारी निभाएं।
गौरतलब है कि गंगा करोड़ों लोगों की आस्था और आजीविका का आधार है। इसे बचाना केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि हमारे भविष्य को सुरक्षित करने का संकल्प है।






