
जन एक्सप्रेस हरिद्वार/ (चंद्रप्रकाश बहुगुणा ):\सुबह की ठंड, यज्ञशाला में गूंजते वैदिक मंत्र और अग्नि की लपटों के बीच सजे हवन कुंड—शांतिकुंज के यज्ञशाला में गायत्री महायज्ञ का दृश्य किसी हवन से अधिक एक जीवंत अनुभव बन गया। हवन कुंडों के चारों ओर बैठे साधक केवल आहुतियाँ नहीं दे रहे थे, वे अपने भीतर और समाज के लिए परिवर्तन का संकल्प भी जगा रहे थे। हर कुंड के पास शांतिकुंज कार्यकर्ताओं सहित अलग-अलग प्रांतों से आए परिजन बैठे थे। कोई व्यवसायी था, कोई शिक्षक, कोई छात्र तो कोई गृहिणी, विभिन्न विधाओं से जुड़े लोग। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जब घी और हवन सामग्री अग्नि को समर्पित किए गए, तो वातावरण में एकाग्रता और शांति स्पष्ट महसूस की जा सकती थी। कई साधकों की आंखों में भावुकता थी मानो वे अपने जीवन की नकारात्मकताओं को अग्नि को सौंप रहे हों।
महायज्ञ में शामिल झारखंड के मनोज कुमार बताते हैं कि हवन कुंड उनके लिए केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम है। वहीं युवाओं का कहना था कि हम पहली बार शांतिकुंज आये हैं और यज्ञ में भाग लेकर उन्हें संगठन की शक्ति का अनुभव हुआ। मंत्र सिखाते स्वयंसेवक और अनुशासन संभालती मातृशक्ति आयोजन की रीढ़ नजर आई। यज्ञशाला में अनुशासन विशेष रूप से दिखाई दिया। हर कुंड पर समय, क्रम और विधि का पालन हुआ। स्वयंसेवक लगातार साधकों का मार्गदर्शन करते रहे। अग्नि की लौ के साथ उठता धुआं जैसे पूरे क्षेत्र को एक अदृश्य सूत्र में बांध रहा था।शांतिकुंज के व्यवस्थापक योगेन्द्र गिरि ने बताया कि शांतिकुंज युगऋषिद्वय पूज्य आचार्यश्री एवं वंदनीया माता की साधना स्थली और कर्मभूमि है। यहां स्थापना काल से ही नित्य हवन होता है। प्रतिदिन हजारों लोग श्रद्धा भाव से हवन करते हैं। हवन कुंडों के माध्यम से साधकों को संकल्प, साधना और संगठन की त्रिवेणी से जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है।
यज्ञ पूर्णाहुति के समय जब सभी साधक एक साथ खड़े हुए, तो यज्ञशाला में गूंजा वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव। यह स्पष्ट था कि हवन कुंडों के चारों ओर जगा यह संकल्प आयोजन समाप्त होने के बाद भी लोगों के जीवन में आगे बढ़ता रहेगा।






