
जन एक्सप्रेस उत्तरकाशी (धराली): गंगोत्री धाम के समीप धराली क्षेत्र में आई आपदा की भयावहता ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों ने जहां हादसे की गंभीरता बयां कर दी, वहीं धरातल पर चल रहे राहत कार्यों ने शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।रेस्क्यू ऑपरेशन में प्राथमिकता का विवाद प्रशासन का पहला फोकस गंगनानी से गंगोत्री के बीच फंसे यात्रियों को सुरक्षित निकालने पर रहा। इसमें बाहर से आए श्रद्धालुओं को प्राथमिकता दी गई, जिससे स्थानीयों में नाराजगी है। पीड़ितों का आरोप है कि स्थानीय लोगों की अनदेखी कर बाहरी पर्यटकों को तवज्जो दी जा रही है।
‘बस एक बार धराली भेज दो, हम खुद ढूंढ लेंगे अपनों को’
धराली के कई स्थानीय लोग अपने लापता परिजनों की तलाश में हेलीपैड पर डटे हुए हैं। राकेश, गोविंद, शिवानी, संतोष, सरोजनी जैसे अनगिनत नाम हैं जो रोज हेलिकॉप्टर की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगती है।
‘सब कुछ उजड़ गया, ऊपर से केवल 5 हजार का चेक!’
आपदा के बाद जिलाधिकारी की ओर से पांच-पांच हजार रुपये की सहायता राशि बांटी गई, जिससे लोगों की नाराजगी और बढ़ गई। जनदबाव के बाद अब सरकार ने मुआवजा बढ़ाकर पांच लाख कर दिया है, लेकिन स्थानीयों की मांग केदारनाथ और वरुणावत आपदा के अनुरूप मुआवजे की है।
राजनीतिक गलियारों में भी गरमाई बहस
कांग्रेस और अन्य संगठन आपदा प्रबंधन में सरकार को पूरी तरह विफल बता रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा ने प्रशासन पर सच्चाई छिपाने का आरोप लगाते हुए कहा कि दो दिन तक उन्हें लिम्चागाड़ से आगे नहीं जाने दिया गया। उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने भी स्थानीयों की आवाज को दबाने का आरोप लगाया है।
सरकार की अग्निपरीक्षा: राहत कार्यों से पहले विश्वास बहाली जरूरी
धराली के ज़ख्मों को भरने के लिए केवल हेलिकॉप्टर नहीं, ईमानदार और संवेदनशील प्रशासन की दरकार है। जब तक स्थानीय लोग खुद को प्राथमिकता का हिस्सा नहीं समझेंगे, तब तक विश्वास की बहाली अधूरी रहेगी।






