नामों की सियासत: चुनावी रण में भावनाओं का नया हथियार बनी ‘नामकरण राजनीति
बसपा-सपा-कांग्रेस के बीच प्रतीकों की होड़ तेज, कांशीराम से लेकर परशुरामपुरी तक नामों के बदलाव ने पकड़ी रफ्तार; भाजपा भी पीछे नहीं

जन एक्सप्रेस, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासी ज़मीन पर आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही अब नामकरण की राजनीति एक बार फिर उफान पर है। सत्ता तक पहुंचने की रणनीतियों में अब केवल जातीय समीकरण या विकास के वादे नहीं, बल्कि प्रतीकों और नामों के सहारे भावनात्मक लहर को भी हवा दी जा रही है।बसपा संस्थापक कांशीराम के नाम पर जब सपा और कांग्रेस ने भी दांव चलना शुरू किया, तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा पर नाम बदलने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला। मायावती ने याद दिलाया कि कैसे उनकी सरकार में कासगंज का नाम बदलकर कांशीरामनगर किया गया था, जिसे अखिलेश यादव ने सपा की सत्ता में आते ही फिर से बदल दिया।मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि सपा सरकार ने उन कई जिलों और संस्थानों के नाम भी पलटे, जिन्हें बसपा सरकार ने वंचित वर्ग के सम्मान में बदला था। इनमें अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, हाथरस को महमायानगर, कानपुर देहात को रमाबाई नगर और केजीएमयू को छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी बनाना शामिल था।
सियासत के एजेंडे में ‘नाम’ क्यों?
सिर्फ बसपा और सपा ही नहीं, भाजपा की सरकार ने भी नामकरण को अपनी सांस्कृतिक पुनरुत्थान की रणनीति से जोड़ दिया है। इलाहाबाद को प्रयागराज, फैजाबाद को अयोध्या, मुगलसराय को दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन और हाल ही में जलालाबाद को परशुरामपुरी नाम देने की घटनाएं इसी रणनीति की कड़ी हैं।
2027 की तैयारियों में नामकरण होगा बड़ा मुद्दा
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो 2027 के विधानसभा चुनावों में नामकरण की यह राजनीति और भी तीव्र होगी। हर दल अब सामाजिक वर्गों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए नामों और प्रतीकों का सहारा ले रहा है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव गोमती रिवरफ्रंट पर कांशीराम समेत कई महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाने का ऐलान कर चुके हैं।वहीं भाजपा सरकार के अधीन अलीगढ़ को हरिगढ़, मुजफ्फरनगर को लक्ष्मीनगर, और फिरोजाबाद को चंद्रनगर करने के प्रस्ताव भी चर्चा में हैं, जो जल्द ही हकीकत बन सकते हैं।






