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LDA: शिकायतकर्ता नहीं, अवैध निर्माणों के संरक्षक प्रवर्तन अधिकारियों का गिरोह सक्रिय

LDA उपाध्यक्ष की नज़र शिकायतकर्ताओं पर तीखी, मगर भ्रष्ट प्रवर्तन अधिकारियों पर क्यों नहीं?

जन एक्सप्रेस, लखनऊ।
राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस नीति का दावा ज़मीनी स्तर पर सवालों के घेरे में है।

ताज़ा मामला लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) से जुड़ा है, जहां उपाध्यक्ष द्वारा जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत करने वाले नागरिकों की निजता भंग करते हुए उनके नाम सार्वजनिक कर दिए गए हैं- वह भी तब, जब ये शिकायतें प्राधिकरण में सक्रिय अवैध निर्माणों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ की गई थीं।

चौंकाने वाली बात यह है कि जिन प्रवर्तन अधिकारियों- अवर अभियंताओं, जोनल अधिकारियों आदि- पर अवैध निर्माणों को संरक्षित करने के गंभीर आरोप हैं, उन पर किसी कठोर कार्यवाही की बजाय उपाध्यक्ष की नजर शिकायतकर्ताओं पर ही केंद्रित नजर आती है। सवाल उठता है- क्या LDA उपाध्यक्ष भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों के खिलाफ कार्रवाई को ही व्यवस्था सुधार मानते हैं?

प्रवर्तन अधिकारियों का ‘संरक्षण गैंग’ बेनकाब

सूत्रों के अनुसार, प्राधिकरण के प्रवर्तन जोन-1 (पत्रकारपुरम चौराहा) में आवासीय भूखंडों पर खुलेआम व्यवसायिक निर्माण जारी हैं। वहीं, जोन-5 में 82 अवैध रो हाउस पर शासन से वैधानिक जांच आने के बावजूद निर्माण कार्य अभी तक रोका नहीं गया है। शिकायतकर्ताओं ने इन निर्माणों के पीछे विहित प्राधिकारी, जोनल अधिकारियों और अभियंताओं की मिलीभगत की ओर इशारा किया है।

क्या उपाध्यक्ष इस बात का जवाब देंगे कि…

आखिर किसके संरक्षण में ये निर्माण जारी हैं? क्या अवैध निर्माण की शिकायतें करने वालों को ही दोषी ठहराकर मूल दोषियों को बचाने की कोशिश हो रही है?

केवल नोटिसबाज़ी और कागज़ी कार्यवाही

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि LDA द्वारा केवल खानापूर्ति करते हुए नोटिस जारी कर दिए जाते हैं, जबकि आवास एवं शहरी नियोजन अधिनियम, 1973 (संशोधित 1997) के अंतर्गत ध्वस्तीकरण और सीलिंग की त्वरित कार्रवाई नहीं होती। परिणामस्वरूप अवैध निर्माण बिना रोक-टोक के पूरे हो जाते हैं और बाद में अध्यासित होकर ‘कानूनी’ ढांचा बनने लगते हैं।

क्या अवैध निर्माणों के पीछे भ्रष्ट तंत्र पर गिरेगा उपाध्यक्ष का डंडा?

लखनऊ में अवैध निर्माण कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता जा रहा है कि इसके पीछे एक संगठित भ्रष्ट तंत्र काम कर रहा है- जिसमें नीचे से लेकर ऊपर तक के अधिकारी शामिल हैं। इस तंत्र में प्रवर्तन इंजीनियर, जोनल अधिकारी और प्रभावशाली बिल्डरों की मजबूत साठगांठ है। जब तक इस तंत्र को तोड़ा नहीं जाता, तब तक किसी भी स्तर की कार्रवाई महज़ दिखावा होगी।

उपाध्यक्ष पर गंभीर सवाल

क्या उपाध्यक्ष अवैध निर्माणों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ सीधी और पारदर्शी कार्रवाई करेंगे?

क्या जनहित में आवाज उठाने वालों की निजता भंग करना ‘शासन का उत्तरदायित्व’ है?

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने वाले नागरिकों को ‘शिकायती गिरोह’ बताकर डराना सही है?

यदि उपाध्यक्ष वाकई लखनऊ को अवैध निर्माणों के दंश से मुक्त करना चाहते हैं, तो उन्हें केवल शिकायतकर्ताओं को कठघरे में खड़ा करने के बजाय प्रवर्तन अधिकारियों के भ्रष्ट गिरोह पर कठोर कार्रवाई करनी होगी।

वरना यह धारणा बनती जा रही है कि LDA अब “लखनऊ ध्वस्त विकास प्राधिकरण” बन चुका है, जहां ईंटें भ्रष्टाचार की नींव पर रखी जा रही हैं और जनहित केवल फ़ाइलों में दफ़न है।

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