
जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी | चंद्रप्रकाश बहुगुणा |देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने वाली उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी ब्लॉक स्थित गोरशाली गांव की ऐतिहासिक रामलीला ने अपने 122 स्वर्णिम वर्षों का सफर पूरा कर लिया है। टिहरी रियासत के दौर से शुरू हुई यह रामलीला आज भी अपनी अनूठी परंपराओं और धार्मिक आस्था के कारण पूरे क्षेत्र में विशेष पहचान रखती है।उत्तरकाशी मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर गोरशाली गांव में बर्फीली ठंड के बीच ग्रामीण पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ रामलीला का मंचन कर रहे हैं। वर्ष 1904 में शुरू हुई यह रामलीला आज भी उसी परंपरा और मर्यादा के साथ आयोजित की जाती है।इस रामलीला की सबसे खास बात यह है कि राजशाही काल के प्रतिबंध के चलते यहां भगवान राम के पात्र का राजतिलक नहीं किया जाता था। इसके स्थान पर गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का राजतिलक किया जाता है। हालांकि, करीब 73 वर्ष पूर्व राजशाही समाप्त होने के बाद अब ईष्ट बासुकी नाग की डोली के समक्ष भगवान राम को मंत्रोच्चार के साथ मुकुट पहनाया जाता है।ग्रामीणों के अनुसार, जब गोरशाली गांव में रामलीला की शुरुआत हुई तो टिहरी रियासत के गुप्तचरों ने इसकी सूचना राजा तक पहुंचाई। राजा को भगवान राम के पात्र के राजतिलक पर आपत्ति हुई और रामलीला पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बाद में गांव के बुजुर्ग अवि सिंह और मातबर सिंह चौहान ने कारोबारी राधा बल्लभ और घनानंद खंडूड़ी के माध्यम से राजा से क्षमा याचना कर पैरवी की। इसके बाद राजा ने ताम्र पत्र देकर रामलीला को मान्यता दी और बासुकी नाग देवता के राजतिलक की शर्त रखी, जिसे ग्रामीणों ने स्वीकार किया।
रामलीला समिति के अनुसार, मंगसीर माह की दीपावली के दूसरे दिन ध्वजा फहराने के साथ रामलीला की शुरुआत होती है। 21 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में रामकथा, हनुमान चालीसा, कर्मकांड, अनुष्ठान और दोपहर में रामलीला का मंचन किया जाता है। इस दौरान गांव के करीब 300 परिवार पूरे तन-मन-धन से सहभागिता निभाते हैं।चारधाम विकास परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष और ग्रामीण सूरत राम नौटियाल ने बताया कि रामलीला के दौरान सभी पात्र और समिति सदस्य 21 दिनों तक व्रतवत रहते हैं और मंदिर परिसर में ही निवास करते हैं। उन्होंने बताया कि यह परंपरा गांव के आलम सिंह चौहान द्वारा शुरू की गई थी, जिसे आज भी जीवित रखा गया है।गांव के बुजुर्ग मदन सिंह राणा और अब्बल सिंह ने बताया कि रियासत काल में अंग्रेज शिकारी और लकड़ी कारोबारी फ्रेडरिक विल्सन ने गोरशाली की रामलीला की प्रशंसा सुनी थी। वर्ष 1914 में उन्होंने हर्षिल में ग्रामीणों से रामलीला का मंचन करवाया और प्रसन्न होकर समिति को 100 स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार स्वरूप दी थीं।श्री वासुकी नाग देवता मंदिर पुनरोत्थान एवं पर्यटन समिति के अध्यक्ष सुभाष नौटियाल ने बताया कि राजशाही काल में रावण वध का मंचन भी नहीं किया जाता था, लेकिन अब सभी प्रसंग पूरे विधि-विधान से मंचित किए जाते हैं।रामलीला समिति गोरशाली के अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह राणा ने कहा कि यह रामलीला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि गांव की सामूहिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक भी है। युवा कलाकार और भगवान राम का पात्र निभा चुके भगवान सिंह राणा ने बताया कि 100 वर्षों से अधिक पुरानी इस परंपरा को नई पीढ़ी भी पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रही है।गोरशाली गांव की यह ऐतिहासिक रामलीला आज भी उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अपनी अलग पहचान बनाए हुए






