आंबेडकर विश्वविद्यालय: शिक्षा का मंदिर या दमन का गढ़? वीडियो बनाने पर छात्र को पुलिस ने उठाया

जनएक्सप्रेस, लखनऊ: शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विश्वविद्यालय अब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के कब्रिस्तान बनते जा रहे हैं। ताजा मामला आंबेडकर विश्वविद्यालय का है, जहां एक साधारण छात्र सौरभ कठेरिया को पुलिस ने परिसर से ही “सुपर फास्ट” अंदाज में उठा लिया। सौरभ, जो एमए जर्नलिज्म का छात्र है, ने केवल परिसर में मौजूद पुलिस की “छावनी” का वीडियो बनाने की कोशिश की थी। लेकिन वीडियो बनाने का अपराध तो किसी साम्राज्य विरोधी दस्तावेज तैयार करने जैसा लगने लगा, और उसे तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंचा दिया गया।

प्रॉक्टर साहब: शिक्षक या सत्ता के पैरोकार?
विश्वविद्यालय में पढ़ रहे शुभम अहाके ने कहा कि यह तमाशा विश्वविद्यालय के कार्यभारी प्रॉक्टर साहब के सामने हुआ, जो शिक्षक धर्म निभाने के बजाय प्रशासन के “प्रचारक धर्म” में ज्यादा रुचि रखते दिखे। प्रॉक्टर साहब की चुप्पी ने यह साबित कर दिया कि छात्रों की आवाज को दबाना अब उनकी प्राथमिकता बन चुकी है।विद्यालय में पढ़ रहे बच्चों का कहना है कि क्या प्रॉक्टर अब प्राचीन युग के जमींदारों की भूमिका निभाने लगे हैं, जहां छात्रों को “आतंकवादी” का टैग देकर संस्थान में भय का माहौल बनाया जा रहा है? आए दिन बीबीएयू में छात्रों के आवाज को दबाने का कान प्रशासन द्वारा किया जाता है।
क्या गार्ड सिर्फ आईडी चेकिंग के लिए हैं?सौर
सौरभ कठेरिया से जब हमारे संवाददाता ने बात कि तो उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के गार्ड साहब, जो शायद सुरक्षा के नाम पर केवल आईडी कार्ड चेक करने के लिए तैनात हैं, पुलिस की इस जबरदस्ती पर मूकदर्शक बने रहे। क्या गार्ड की जिम्मेदारी केवल “लाइब्रेरी का सिक्योरिटी गेट” बनकर रह गई है? या फिर वर्दीधारी गुंडे अब लाइब्रेरी में आकर छात्रों का मानसिक उत्पीड़न करने का नया तरीका खोज चुके हैं?
बुद्धिजीवी प्रोफेसर या कुर्सी के योद्धा?
वहां पढ रहे छात्र, प्रोफेसर पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि सवाल उन बुद्धिजीवी प्रोफेसरों पर भी उठता है, जो अपनी कुर्सियों पर रीढ़विहीन बैठे केवल विश्वविद्यालय की “न्यायिक परंपरा” का पतन देख रहे हैं। क्या प्रोफेसर सिर्फ अपने प्रमोशन और तनख्वाह के गणित तक ही सीमित रहेंगे? या किसी दिन अपनी रीढ़ सीधी कर छात्रों के अधिकारों के लिए खड़े होंगे? ऐसा लगता है कि आंबेडकर विश्वविद्यालय ने शिक्षा और अभिव्यक्ति के साथ-साथ मानवाधिकारों को भी इतिहास की किताबों में बंद कर दिया है।





