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देहरादून में बेखौफ बिल्डर का ‘बिल्डिंग राज’: सचिव का नाम लेकर निगम टीम को लौटाया, सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा

सहस्रधारा रोड की एटीएस कॉलोनी में 3800 वर्ग मीटर निगम भूमि पर अवैध निर्माण

जन एक्सप्रेस/देहरादून : उत्तराखंड की राजधानी में रियल एस्टेट माफिया किस कदर बेलगाम हो चुका है, इसकी मिसाल शनिवार को सहस्रधारा रोड स्थित एटीएस कॉलोनी में देखने को मिली। यहाँ एक निजी बिल्डर ने नगर निगम की करीब 3800 वर्ग मीटर भूमि पर कब्जा कर लिया है और फर्जी तथ्यों के आधार पर नक्शे पास करा लिए हैं। जब निगम की टीम मौके पर जांच को पहुंची, तो बिल्डर ने उन्हें धमकाकर लौटा दिया।

‘ये फाइल सचिव के पास है… आप कौन होते हैं?’
नगर निगम की निरीक्षक (भूमि) सुधा यादव जब लेखपाल और पुलिसकर्मी के साथ दोपहर बाद जांच को पहुँचीं, तो बिल्डर ने खुलेआम रास्ता रोक दिया।
टीम को यह कहकर रोक दिया गया कि अब कौन सी जांच हो रही है? फाइल सचिव के पास है… आप लोग यहां क्यों आए हैं?” अधिकारियों ने स्थिति को भांपते हुए जमीन पर केवल निगाह डालकर ही वापसी कर ली।

‘सरकारी ज़मीन पर अवैध निर्माण… और नक्शे भी पास!’
एमडीडीए (Mussoorie Dehradun Development Authority) के उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी से जब कॉलोनीवासियों ने शिकायत की, तो उन्होंने नक्शे और स्थल स्थिति की जांच के आदेश दिए हैं। शिकायत में बताया गया कि नक्शा पास कराते समय फर्जी मार्ग दिखाया गया और बिना संपर्क मार्ग के भवन निर्माण चल रहा है।

पुराने ‘जमीन घोटाले’ से जुड़ा है मामला
यह विवाद 2023-24 में नगर निगम की ज़मीन के अवैध हस्तांतरण से जुड़ा है। बिल्डर ने 1250 वर्ग मीटर भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव दिया था, जिसके बदले जो ज़मीन निगम को दी जानी थी वह ढांग, पेड़ों और बंजर जमीन वाली थी — जिसका बाजार मूल्य बहुत कम था। एटीएस कॉलोनी की जमीन का सर्किल रेट 75,000 रुपये प्रति वर्गगज है, जबकि बदले में प्रस्तावित ज़मीन का रेट सिर्फ 26,000–45,000 प्रति वर्गगज।

गोल्डन फॉरेस्ट की संपत्ति, सुप्रीम कोर्ट में मामला
इस भूमि पर स्वामित्व गोल्डन फॉरेस्ट लिमिटेड का है, जिसकी तमाम संपत्तियाँ सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नीलाम की जानी हैं। यह जमीन फिलहाल नगर निगम को पार्क और सार्वजनिक उपयोग के लिए सौंपी गई थी, लेकिन सवाल यह है कि बिल्डर को यह ज़मीन देने का आदेश किसने दिया?

बिल्डर बनाम शासन: किसका चलेगा राज?
यह मामला साफ दिखाता है कि कैसे निजी बिल्डर सरकारी भूमि को कब्जा करने से नहीं डरते, और कैसे अधिकारी महज़ दर्शक बनकर रह जाते हैं। अब देखना यह है कि क्या एमडीडीए और शासन इस बिल्डर के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर सकेगा, या यह फाइलें ‘सचिव के पास’ वाली धमकी में ही गुम हो जाएंगी।

देहरादून की ज़मीनों पर कब्ज़ा, हेरफेर और सत्ता संरक्षण का यह खेल तब तक नहीं रुकेगा, जब तक कार्रवाई सिर्फ जांच आदेशों तक सीमित रहेगी। अब वक्त है निर्णायक कदमों का — वरना, शहर की जमीनें धीरे-धीरे बिल्डरों की जागीर बन जाएंगी।

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