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नेताजी सुभाष चंद्र बोस: पराक्रम दिवस पर जानिए आजादी के नायक का इतिहास और रहस्यमयी अंत

जन एक्सप्रेस /मानसी निर्मल /लखनऊ:आज सुभाष चंद्र बोस जी की 128वीं जयंती है। भारत देश की आज़ादी के महान नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। सुभाष चंद्र बोस जी का जन्म 23 जनवरी ,1897 में ओडिशा के कर्नाटक में एक बंगाली फैमिली में हुआ था। इनकी माँ का नाम प्रभावती और पिता का नाम जानकीनाथ था। सुभाष  चंद्र बोस ने इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा भी पास की थी।  जिसमे उन्हें चौथा रैंक प्राप्त हुआ था और उन्होंने साल 1937 में अपनी सेक्रेटरी एमिली से शादी की थी जिससे उन्हें एक बेटी हुई जिसका नाम अनीता रखा गया।

स्वतंत्रता संग्राम और कार्य
ब्रिटिश शासन के दौरान देश की आज़ादी के लिए  नेताजी के दिए नारों ने देशभक्ति की अलख जगा दी थी- तुम मुझे खून दो , मैं तुम्हें आजादी दूंगा, जय हिन्द, दिल्ली चलो, इसमें से तो ‘जय हिंद’ का नारा राष्ट्रीय नारा बन गया। देश की आजादी के लिए सुभाषचंद्र बोस ने 1943 में सिंगापुर में आजाद हिंद फौज सरकार की स्थापना की  जिसे 9 देशों की सरकारों ने मान्यता दी थी।  जिसमें जर्मनी, जापान और फिलीपींस भी शामिल थे। इतना ही  नहीं सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ नाम से रेडियो स्टेशन भी शुरू किया था। सुभाष  चंद्र ने पूर्वी एशिया में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व भी किया था। अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास में डाला गया था। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 में छह महीने का कारावास हुआ।

सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज के साथ 1944 में म्यांमार (पूर्व में बर्मा) पहुंचे थे।  यहीं पर उन्होंने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा लगाया था।  दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा था।

दुर्घटना और मृत्यु
बात करें अगर इनकी मृत्यु की तो यह महज़ एक रहस्य बनके रह गया है। 18 अगस्त 1945 को  एक विमान दुर्घटना के बाद नेताजी लापता हो गए। इसके लिए 3 जांच आयोग बैठाए गए जिसमें से दो ने दुर्घटना के दौरान मृत्यु का दावा किया था जबकि तीसरी कमेटी का दावा था कि घटना के बाद सुभाष चंद्र बोस जिंदा थे। 23 अगस्त 1945 को टोक्यो रेडियो ने बताया कि नेताजी एक बड़े बम वर्ष विमान से आ रहे थे तभी हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया उनके साथ प्लेन में मौजूद जनरल ,पाइलेट तथा अन्य लोग भी मारे गए थे। कर्नल हबिबुर्रहमान की माने तोह उनके अनुसार नेताजी का अंतिम संस्कार ताइकोहू में ही कर डफिया गया था। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार के द्वारा और उनसे प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को 11 बजे हुई थी।

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