हरछठ व्रत विशेष: जानें कब है व्रत, क्यों नहीं किया जाता इस दिन गाय का दूध सेवन
14 अगस्त को मनाया जाएगा हरछठ व्रत, बलराम जयंती पर महिलाएं करेंगी संतान की सुख-समृद्धि की कामना

जन एक्सप्रेस लखनऊ:हरछठ व्रत, जिसे हलषष्ठी भी कहा जाता है, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पवित्र पर्व 14 अगस्त 2025, बुधवार को मनाया जाएगा। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी कारण इसे बलराम जयंती भी कहा जाता है।
षष्ठी तिथि का मुहूर्त:
प्रारंभ: 14 अगस्त को तड़के 2:00 बजे
समाप्ति: 15 अगस्त की तड़के
पूजा का शुभ समय: दोपहर या शाम (राहुकाल दोपहर 2:04 से 3:43 तक रहेगा — इस समय पूजा से बचें)
नक्षत्र: सुबह 9:06 बजे तक रेवती, फिर अश्विनी नक्षत्र प्रारंभ होगा
व्रत की विधि और पूजा का महत्व:
इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर अपनी संतान की दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। व्रत में पारंपरिक रूप से महिलाएं गोबर से छठी माता की प्रतिमा दीवार पर बनाती हैं और उनके साथ भगवान गणेश, कार्तिकेय और माता गौरा की पूजा करती हैं।
षष्ठी माता, जिन्हें छठी मैय्या कहा जाता है, संतान की रक्षा और उनके कष्ट हरने वाली देवी मानी जाती हैं। इस व्रत में केवल भैंस का दूध, घी, और सूखे मेवे का सेवन किया जाता है। गाय के दूध और दही का सेवन वर्जित होता है। पूजा के अंत में सतअनाज (सात प्रकार के अनाज) का भोग चढ़ाया जाता है।
हरछठ व्रत की पौराणिक कथा:
धारणा है कि द्वापर युग में एक शांति नामक ग्वालिन, जो गर्भवती थी, व्रत के दिन भी गाय और भैंस के मिश्रित दूध, दही और मक्खन बेचने हेतु दूसरे गांव गई। रास्ते में छठी माता का अपमान हुआ, जिससे उसकी संतान को कष्ट हुआ। बाद में उसने व्रत विधिपूर्वक किया और उसकी संतान की रक्षा हुई। यह कथा आज भी महिलाओं को सुनाई जाती है, जिससे संतान के प्रति श्रद्धा और व्रत के नियमों का महत्व समझाया जाता है।
सांस्कृतिक महत्व:
हरछठ व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मातृत्व की भावना, संतान के प्रति प्रेम और सदियों पुरानी लोक मान्यताओं की अभिव्यक्ति है। गांवों में आज भी महिलाएं इस दिन पारंपरिक गीत गाती हैं, कथा सुनती हैं और घर-परिवार की खुशहाली के लिए देवी से प्रार्थना करती हैं।






