जौनपुर आरटीओ का हाल: 15 हजार ऑनलाइन फीस के बाद भी ट्रेड लाइसेंस अटका, अतिरिक्त रकम मांगने का आरोप

संवाददाता : मनोज कुमार उपाध्याय
जन एक्सप्रेस / जौनपुर : जौनपुर का संभागीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) एक बार फिर कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में है। ताजा मामला ट्रेड लाइसेंस जारी किए जाने से जुड़ा है, जहां आवेदक का दावा है कि निर्धारित सरकारी शुल्क ऑनलाइन जमा करने के बावजूद महीनों से प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया। इससे भी गंभीर आरोप यह है कि लाइसेंस जारी करने के नाम पर कथित तौर पर 15 हजार रुपये की अतिरिक्त रकम मांगी जा रही है। हालांकि, अतिरिक्त रकम मांगने के आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
ऑनलाइन 15 हजार जमा, फिर भी प्रमाणपत्र का इंतजार
रामनगर स्थित ए.पी.एस. एंटरप्राइजेज की ओर से ट्रेड लाइसेंस प्रमाणपत्र जारी कराने के लिए आवेदन किया गया है। उपलब्ध भुगतान विवरण के मुताबिक ट्रेड प्रमाणपत्र के लिए 15,000 रुपये की निर्धारित ऑनलाइन फीस जमा की जा चुकी है। भुगतान रसीद संख्या यूपी622608आई0000075 और आवेदन संख्या यूपी2608टी000000114 दर्ज है। आवेदक पक्ष का कहना है कि जब सरकारी शुल्क नियमानुसार ऑनलाइन जमा हो चुका है, तो प्रमाणपत्र जारी करने में आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है? शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कथित रूप से अलग से 15 हजार रुपये की मांग की जा रही है।
फोन बजता रहा, जवाब नहीं मिला
मामले में आरटीओ जौनपुर का पक्ष जानने के लिए जन एक्सप्रेस संवाददाता ने आरटीओ के मोबाइल नंबर पर संपर्क किया, लेकिन मोबाइल स्विच ऑफ मिला। इसके बाद कार्यालय में तैनात पटल बाबू नईम के मोबाइल नंबर पर भी दो बार फोन किया गया। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई। इस कारण खबर लिखे जाने तक विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आ सका।
पहले भी लगते रहे हैं गंभीर आरोप
जौनपुर आरटीओ कार्यालय में कथित सुविधा शुल्क और कामकाज को लेकर पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। कुछ समय पूर्व एक मोटर मालिक द्वारा कई वाहनों का काफिला कार्यालय परिसर में खड़ा किए जाने के बाद मामला सुर्खियों में आया था। विवाद बढ़ने पर विभागीय स्तर पर एक बाबू के निलंबन की कार्रवाई भी सामने आई थी।
सवाल सिर्फ एक लाइसेंस का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है
सवाल यह है कि जब ऑनलाइन व्यवस्था के जरिए निर्धारित शुल्क जमा कराया जा रहा है, तो फिर आवेदकों को प्रमाणपत्र के लिए महीनों इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? क्या डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था के बावजूद फाइलों को जानबूझकर लंबित रखने की कोई गुंजाइश बची है? यदि अतिरिक्त रकम मांगने के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक आवेदक की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल होगा। अब निगाहें परिवहन विभाग के उच्चाधिकारियों पर हैं कि वे मामले की जांच कराकर सच्चाई सामने लाते हैं या फिर यह शिकायत भी सरकारी दफ्तरों की फाइलों में दबकर रह जाती है।
आरटीओ अधिकारियों का पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।






