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सीतापुर में टंकी धड़ाम… NHAI का डिबारमेंट… फिर भी लखनऊ फ्लाईओवर का ठेका NCC को?

करोड़ों की परियोजनाओं पर बड़ा सवाल: क्या पिछला रिकॉर्ड देखे बिना दिया गया नया भरोसा?

जन एक्सप्रेस विशेष / राज्य मुख्यालय।

उत्तर प्रदेश की जनता के टैक्स से बनने वाली परियोजनाओं में जवाबदेही आखिर तय कौन करेगा? सवाल इसलिए क्योंकि जल जीवन मिशन के तहत सीतापुर में करोड़ों की पानी की टंकी भरभराकर गिर जाती है… उसी अवधि में National Highways Authority of India (NHAI) द्वारा डिबारमेंट आदेश का मामला सामने आता है… और फिर राजधानी लखनऊ में फ्लाईओवर निर्माण का ठेका उसी कंपनी- NCC Limited (नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड) को सौंप दिया जाता है।

ठेका एजेंसी: Lucknow Development Authority (एलडीए)

मामला 1: सीतापुर में गिरी करोड़ों की टंकी

मई 2025 में सीतापुर के चुनका गांव में लगभग 5 करोड़ रुपये से अधिक लागत की पानी की टंकी ढह गई। टंकी जनवरी 2024 में शुरू हुई थी- यानी एक वर्ष के भीतर संरचना जवाब दे गई।

ग्रामीणों का दावा था- “दरारें पहले से दिख रही थीं।”

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस टंकी का निर्माण कार्य भी NCC Limited द्वारा ही किया गया था।

जांच बैठी। कार्रवाई की बातें हुईं। ब्लैकलिस्ट प्रक्रिया की चर्चा भी सामने आई। लेकिन अंतिम तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई। जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई- यह अब भी स्पष्ट नहीं।

क्या इस मामले की स्वतंत्र इंजीनियरिंग समीक्षा कराई गई? क्या संबंधित कंपनी की कार्यप्रणाली का समग्र मूल्यांकन हुआ? जवाब अस्पष्ट है।

मामला 2: NHAI का डिबारमेंट आदेश और फिर स्टे

इसी बीच National Highways Authority of India द्वारा एनसीसी से जुड़ी इकाई के संदर्भ में डिबारमेंट आदेश जारी किया गया।

कंपनी का पक्ष:

आदेश कन्सेशन अवधि समाप्त होने के बाद जारी किया गया। मध्यस्थता प्रक्रिया लंबित थी। पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। आदेश को विधिक रूप से चुनौती दी गई।

सूत्रों के अनुसार, हाल ही में कंपनी ने सक्षम न्यायालय से डिबारमेंट आदेश के विरुद्ध स्टे ऑर्डर प्राप्त कर लिया है।

लेकिन यहां मूल प्रश्न यह है-

क्या स्टे ऑर्डर मिल जाना, पूर्व की तकनीकी घटनाओं और उठे सवालों को स्वतः समाप्त कर देता है?

कानूनी दृष्टि से स्टे का अर्थ है- अंतिम निर्णय तक आदेश का प्रभाव रोका जाना।

परंतु प्रशासनिक और तकनीकी दृष्टि से- क्या जोखिम मूल्यांकन फिर भी आवश्यक नहीं?

सदन में क्या बोले जलशक्ति मंत्री?

विधानसभा में उठे सवालों पर उत्तर प्रदेश के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने स्पष्ट कहा:

“यह गरीबों की योजना है। चार साल में न कभी कंपनी से बात की है, न किसी को जानता हूं। कोई दोषी पाया जाएगा तो कार्रवाई होगी। कोई मिलीभगत नहीं है। यह सरकार मोदी जी और योगी जी की सरकार है। मैं विश्वास दिलाता हूं कि यह भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ेगी।”

मंत्री ने सदन में यह भी बताया:

* लाखों किलोमीटर पाइपलाइन बिछाई गई
* करोड़ों ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन दिए गए
* 24 लोग निलंबित
* 292 को नोटिस
* 10% तक भुगतान काटा गया
* कई मामलों में एफआईआर दर्ज

* “जहां-जहां टंकी डैमेज हुई, कार्रवाई हुई है।”

सबसे बड़ा सवाल: क्या एलडीए ने सीतापुर प्रकरण का संज्ञान लिया?

अब सबसे महत्वपूर्ण बिंदु-

जब यह तथ्य सामने है कि सीतापुर में गिरी टंकी का निर्माण भी NCC Limited ने किया…
जब विधानसभा में मंत्री स्वयं टंकियों के क्षतिग्रस्त होने और कार्रवाई की बात स्वीकार कर चुके हैं…

तो क्या लखनऊ फ्लाईओवर का ठेका देते समय Lucknow Development Authority (एलडीए) ने सीतापुर प्रकरण का औपचारिक संज्ञान लिया?

क्या एलडीए ने-

* सीतापुर टंकी की अंतिम जांच रिपोर्ट मंगाई?
* तकनीकी जवाबदेही की स्थिति स्पष्ट कराई?
* कंपनी की जोखिम प्रोफाइल का स्वतंत्र मूल्यांकन किया?
* NHAI डिबारमेंट और उस पर मिले स्टे की कानूनी स्थिति का परीक्षण किया?
* फ्लाईओवर परियोजना में अतिरिक्त तकनीकी निगरानी या थर्ड-पार्टी स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य किया?

यदि यह सब नहीं हुआ, तो यह केवल प्रक्रियागत निविदा का मामला नहीं- बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।

जवाबदेही बनाम प्रक्रियागत वैधता

एलडीए सूत्रों का कहना है कि ठेका “प्रक्रियागत निविदा” के तहत दिया गया।

लेकिन प्रक्रियागत वैधता और नैतिक जवाबदेही दो अलग बातें हैं।
* निविदा प्रक्रिया नियमों के अनुरूप हो सकती है- पर क्या जोखिम मूल्यांकन भी उतना ही कठोर था?

* राजधानी का फ्लाईओवर हजारों लोगों की रोज़ाना आवाजाही से जुड़ा होगा।
* ऐसे में न्यूनतम नहीं, बल्कि अधिकतम तकनीकी सतर्कता अपेक्षित है।

जन एक्सप्रेस की मांग

एलडीए सार्वजनिक करे-

1. फ्लाईओवर ठेका स्वीकृति की तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट
2. सीतापुर टंकी की जांच रिपोर्ट
3. NHAI डिबारमेंट आदेश और उस पर मिले स्टे का पूरा विवरण सामने आए
4. फ्लाईओवर निर्माण की स्वतंत्र स्ट्रक्चरल ऑडिट कराई जाए

मामला सिर्फ एक कंपनी का नहीं
यह मामला है-
* सरकारी ठेकों की पारदर्शिता का।
* तकनीकी जवाबदेही का।
* और जनता की सुरक्षा का।

सीतापुर की टंकी एक चेतावनी थी।
डिबारमेंट आदेश एक संकेत था।
स्टे ऑर्डर एक कानूनी अंतराल है।

अब देखना है-
क्या लखनऊ का फ्लाईओवर भरोसे की मिसाल बनेगा…
या अगली सुर्खी?

जन एक्सप्रेस इस मुद्दे की तह तक जाएगा।

पाठकगण से अपील:
यदि आपके पास भी एनसीसी से जुड़ी कोई जानकारी है तो व्हाट्सएप करें: 8933805555
या ईमेल करें: janexpresslko@gmail.com
(आपकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी)

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