आस्था, प्रकृति और अनुशासन का संगम है ‘वारुणी पंचकोसी यात्रा’

जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: उत्तरकाशी की पवित्र धरती पर आयोजित होने वाली पंचकोसी (वारुणी) यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, हिमालयी प्रकृति और मानवीय अनुशासन का अनूठा उदाहरण है। चैत्र मास की त्रयोदशी को प्रारंभ होने वाली यह यात्रा वरुणावत पर्वत की परिक्रमा के रूप में संपन्न होती है।
1. यात्रा का मार्ग और आध्यात्मिक पड़ाव
यह यात्रा लगभग 15 से 17 किलोमीटर लंबी है, जिसकी शुरुआत बड़ेथी से होती है। श्रद्धालु वरुणा और गंगा के पावन संगम पर स्नान कर अपनी यात्रा का संकल्प लेते हैं।
प्रमुख पड़ाव और मंदिर:
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मार्ग: बसुंगा ➔ साल्ड ➔ ज्ञाणजा ➔ शिखरेश्वर ➔ संग्राली ➔ पाटा ➔ गंगोरी।
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आध्यात्मिक स्थल: यात्रा के दौरान श्रद्धालु वरुणेश्वर, अखंडेश्वर, जगतनाथ मंदिर, अष्टभुजा दुर्गा, व्यास कुंड और विमलेश्वर महादेव जैसे प्राचीन मंदिरों के दर्शन करते हैं।
2. वैज्ञानिक और स्वास्थ्य पक्ष: ‘नेचर थेरेपी’
धार्मिक आस्था के साथ-साथ इस पैदल यात्रा के कई व्यावहारिक और स्वास्थ्य लाभ भी हैं:
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प्राकृतिक व्यायाम: 17 किमी की ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर पैदल चलना हृदय स्वास्थ्य और शारीरिक सहनशक्ति (Stamina) को बढ़ाता है।
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ऑक्सीजन क्षमता: ऊँचाई वाले क्षेत्रों में ट्रेकिंग से शरीर की ऑक्सीजन उपयोग करने की क्षमता बेहतर होती है।
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मानसिक शांति: घने जंगलों और पहाड़ी शांत वातावरण में चलना तनाव कम करने में सहायक है, जिसे आधुनिक विज्ञान में ‘नेचर थेरेपी’ कहा जाता है।
3. समापन और धार्मिक मान्यता
यात्रा का समापन गंगोरी में असीगंगा और भागीरथी के संगम पर स्नान के साथ होता है। इसके पश्चात श्रद्धालु काशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक कर अपनी मन्नतें पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
रोचक तथ्य: प्राचीन काल में यह यात्रा तीन दिनों तक चलती थी और मुख्य रूप से साधु-संत ही इसमें भाग लेते थे। समय के साथ यह यात्रा अब एक दिन में पूरी की जाती है, जिससे स्थानीय युवाओं और पर्यटकों की भागीदारी भी बढ़ी है।






