जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: सदियों से यह मान्यता रही है कि गंगा का जल कभी खराब नहीं होता और न ही इसमें कीड़े पड़ते हैं। जहाँ अध्यात्म इसे ‘अमृत’ मानता है, वहीं आधुनिक विज्ञान ने इसके पीछे के वास्तविक ‘शिकारियों’ को खोज निकाला है। विज्ञान संचारक डॉ. शम्भू प्रसाद नौटियाल ने बताया कि गंगा की इस स्व-शुद्धिकरण क्षमता का असली राज इसमें मौजूद ‘जीवाणुभोजी’ (Bacteriophage) नामक विशेष वायरस हैं, जिन्हें विज्ञान की भाषा में ‘निंजा वायरस’ कहा जाता है।
1. कुदरत के सटीक शिकारी: बैक्टीरियोफेज
डॉ. नौटियाल के अनुसार, ये सूक्ष्म जीव प्रकृति के सबसे सटीक शिकारी हैं। इनका ढांचा किसी ‘चंद्रयान लैंडर’ की तरह होता है, जिसमें एक बहुकोणीय सिर और छह धागेनुमा पैर होते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें साधारण माइक्रोस्कोप से नहीं देखा जा सकता, लेकिन इनका काम किसी रोबोटिक सेना जैसा सटीक होता है।
2. कैसे काम करते हैं ये ‘नन्हे रक्षक’?
ये वायरस जल में मौजूद केवल उन्हीं बैक्टीरिया को पहचानते हैं जो बीमारियां फैलाते हैं (जैसे हैजा या पेचिश)। इनके काम करने का तरीका बेहद दिलचस्प है:
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पहचान और हमला: जैसे ही कोई हानिकारक बैक्टीरिया पानी में आता है, ये निंजा वायरस उन पर चिपक जाते हैं।
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DNA इंजेक्शन: ये अपना DNA बैक्टीरिया के भीतर इंजेक्ट कर देते हैं।
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विस्फोट: वह बैक्टीरिया स्वयं वायरस बनाने की फैक्ट्री बन जाता है और अंततः फट जाता है। एक बैक्टीरिया के फटने से सैकड़ों नए ‘योद्धा’ बाहर निकलते हैं जो अगले दुश्मन की तलाश शुरू कर देते हैं।

3. गंगा का पारिस्थितिक तंत्र और संरक्षण
डॉ. नौटियाल ने स्पष्ट किया कि ये वायरस इंसानी कोशिकाओं या पानी के लाभदायक तत्वों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। यही कारण है कि अन्य नदियों में प्रदूषण होने पर बैक्टीरिया राज करने लगते हैं, लेकिन गंगा में ये ‘जीवाणुभोजी’ जल को पुनः शुद्ध कर देते हैं।
निष्कर्ष: गंगा को बचाना केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक ईकोसिस्टम को बचाना है जो हजारों वर्षों से इस नदी को जीवनदायिनी बनाए हुए है। यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह और तट सुरक्षित रहेंगे, तो गंगा की यह ‘स्व-शुद्धिकरण’ क्षमता सदैव बनी रहेगी।