लखनऊ में 17 बीघा सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप -जांच में उसी लेखपाल की रिपोर्ट पर उठे सवाल

जन एक्सप्रेस /लखनऊ :- राजधानी लखनऊ में करीब 17 बीघा सरकारी बंजर भूमि पर कथित अवैध कब्जे के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। कैसरगंज से सांसद करण भूषण सिंह द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और सरकारी भूमि को कब्जामुक्त कराने की मांग के बाद मामला और गंभीर हो गया है। वहीं जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जिस लेखपाल की भूमिका और कार्यप्रणाली पर पहले से सवाल उठाए गए, उसी की रिपोर्ट को जांच का आधार बनाया जा रहा है। ऐसे में निष्पक्ष जांच को लेकर शिकायतकर्ता ने गंभीर आपत्ति जताई है।


सांसद करण भूषण सिंह ने 18 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में लखनऊ सदर तहसील के हरचंदपुर कनोरा राजाजीपुरम लखनऊ स्थित गाटा संख्या-5 की करीब 17 बीघा सरकारी बंजर भूमि का मामला उठाया है। पत्र के अनुसार उक्त भूमि राजस्व अभिलेखों में सरकारी बंजर भूमि के रूप में दर्ज है। सांसद ने आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि भूमि पर कथित रूप से अवैध कब्जा कर बस्तियां बसाई गईं और सरकारी जमीन के उपयोग एवं कब्जे को लेकर अनियमितताएं हुईं।
सांसद ने पत्र में यह भी कहा कि मुख्यमंत्री कार्यालय एवं जिलाधिकारी स्तर से पूर्व में कार्रवाई और भूमि की पैमाइश कराने के निर्देश दिए जाने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। आरोप है कि सरकारी भूमि की सही पैमाइश कराने और कथित अवैध कब्जा हटाने के निर्देशों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं किया गया।मामले में सांसद करण भूषण सिंह ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पूरे प्रकरण की किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी अथवा सक्षम और स्वतंत्र टीम से जांच कराई जाए। जांच में आरोप सही पाए जाने पर करीब 17 बीघा सरकारी बंजर भूमि को कथित अवैध कब्जे से मुक्त कराकर दोबारा सरकारी नियंत्रण में लिया जाए।
जिसके खिलाफ शिकायत, उसी की रिपोर्ट पर जांच?
इधर, जांच प्रक्रिया को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। प्राप्त पत्र के अनुसार राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश के शिकायती प्रकोष्ठ की ओर से जिलाधिकारी लखनऊ को शिकायत की जांच कराकर तथ्यात्मक आख्या उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। शिकायत सरकारी बंजर भूमि से अतिक्रमण हटाने और राजस्व स्तर पर कार्रवाई से संबंधित बताई जा रही है।शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस लेखपाल की भूमिका और कार्यप्रणाली को लेकर पहले ही शिकायत एवं आपत्ति दर्ज कराई गई थी, उसी लेखपाल की रिपोर्ट को जांच का आधार बनाया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब किसी कर्मचारी की भूमिका स्वयं जांच के दायरे में सवालों के घेरे में हो, तो उसी से रिपोर्ट तैयार कराना निष्पक्षता और पारदर्शिता की भावना के विपरीत प्रतीत होता है।शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र, वरिष्ठ और उच्चस्तरीय राजस्व अधिकारी अथवा अलग जांच टीम से कराई जाए, ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें और किसी भी स्तर पर जांच प्रभावित होने की आशंका न रहे।
अब उठ रहा सबसे बड़ा सवाल—न्याय कैसे मिलेगा?
करीब 17 बीघा सरकारी भूमि के मामले में सांसद द्वारा निष्पक्ष जांच की मांग और दूसरी ओर उसी कर्मचारी की रिपोर्ट पर जांच आगे बढ़ने के आरोप ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका पर शिकायतकर्ता ने सवाल उठाए हों, यदि उसी की रिपोर्ट को जांच का आधार बना दिया जाए तो निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है?अब निगाहें शासन और जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं कि इस गंभीर प्रकरण में स्वतंत्र जांच कराई जाती है या फिर जांच की प्रक्रिया सवालों के घेरे में ही आगे बढ़ती है। शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदारी तय करने तथा सरकारी भूमि को कथित अवैध कब्जे से मुक्त कराने की मांग दोहराई है।






