सलाखों के पीछे सुलगती रही बेगुनाही, पर समाज की नजरों में मर चुकी थी साख

जन एक्सप्रेस /सुल्तानपुर :- गोसाईगंज के जासापारा की हवाओं में आज एक अजीब सा सन्नाटा है। अदालत से रिहाई का हुक्म तो आ गया, पर उन पांच घरों के आंगनों में खुशी से ज्यादा चीखें बिखरी हुई हैं। अशोक पांडेय, अनुराग पांडेय, रूपम पांडेय, सत्यम पांडेय और सूरज पांडेय… ये सिर्फ पांच नाम नहीं हैं, ये वो पांच जीते-जागते इंसान हैं जिन्हें हमारी पुलिस और न्याय व्यवस्था की एक जल्दबाजी ने जीते जी ‘कातिल’ की अंतहीन कालकोठरी में धकेल दिया था. वे दो महीने… जो उन्होंने लोहे की सलाखों के पीछे, अपनी बेगुनाही की दीवारें पीटते हुए गुजारे, उसकी कीमत क्या चंद पन्नों की ‘क्लीनचिट’ चुका पाएगी?
एक झूठी एफआईआर और पांच परिवारों की तबाही, रातों-रात छिन गई इज्जत…….
जिस समाज में पीढ़ियों की मेहनत से एक नाम और साख बनती है, वहां एक ही पल में इन युवाओं के माथे पर ‘हत्यारे’ का ठप्पा लगा दिया गया। जब पुलिस इन्हें हथकड़ी पहनाकर ले जा रही होगी, तब इनके बूढ़े मां-बाप के दिल पर क्या गुजरी होगी, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता।तिल-तिल मरती रही आत्मा जेल की उस घुटन भरी कोठरी में हर रात इन पांचों ने सिर्फ एक ही सवाल के साथ काटी होगी—”जब हमने कुछ किया ही नहीं, तो हमारी जिंदगी क्यों तबाह की जा रही है? बाहर उनके परिवार समाज के तानों और तिरस्कार की आग में झुलसते रहे।करियर और भविष्य का जनाजा…..जो युवा कल को अपना भविष्य बनाने का सपना देख रहे थे, आज उनके पुलिस रिकॉर्ड पर एक गहरा दाग लग चुका है। भले ही वे बेकसूर साबित हो गए, पर क्या यह सिस्टम उनके बीते हुए दो महीनों के मानसिक तनाव, आंसुओं और आर्थिक बर्बादी को वापस लौटा पाएगा???
सबसे बड़ा सवाल: इस गुनाह का असली गुनहगार कौन?
आज असली सच सामने आ चुका है। आजाद वर्मा की मौत किसी रंजिश में नहीं, बल्कि उसके अपने ही दोस्तों की कार में, एक अवैध पिस्टल के एक्सीडेंटल फायर (Accidental Fire) से हुई थी। लेकिन सवाल यह है कि बिना किसी पुख्ता जांच के, सिर्फ नामजदगी के आधार पर इन पांच ब्राह्मण युवकों को दो महीने तक जेल में सड़ने के लिए किसने मजबूर किया? क्या उस झूठी शिकायत (FIR) करने वाले को इसकी सजा मिलेगी?क्या जांच में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? कानून की किताबों में ‘मुआवजे’ के नियम तो हैं, लेकिन इस जीते-जी दी गई मौत की भरपाई कौन सा सिक्का करेगा???
यह कहानी केवल सुल्तानपुर के पांच युवाओं की नहीं है, यह उस हर बेगुनाह की चीख है जो इस देश के लचर सिस्टम की वेदी पर अपनी इज्जत और जिंदगी की बलि चढ़ा देता है। अदालत की कागजी रिहाई तो मिल गई, पर समाज की अदालतों में इन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने में शायद उम्र बीत जाएगी!!






