
जन एक्सप्रेस /गोपेश्वर :- पहाड़ की लोक संस्कृति, परंपराओं और जागर गायन को नई पहचान दिलाने वाली उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक जागर गायिका एवं संस्कृति संरक्षक डॉ. पवित्रा टम्टा उर्फ पम्मी नवल के नाम एक और उपलब्धि जुड़ने जा रही है। शिक्षा के साथ लोक संस्कृति के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें शिक्षक गौरव सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय समरसता मंच की ओर से 20 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षक सम्मेलन में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया जाएगा।
सम्मेलन को 25 राष्ट्रों के नैतिक समर्थन के साथ आयोजित किया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन में उत्तराखंड से डॉ. पम्मी नवल का चयन होना प्रदेश की लोक संस्कृति और शिक्षा जगत के लिए गौरव की बात माना जा रहा है। चयन समिति ने शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक लोक विरासत को संरक्षित करने के प्रयासों को देखते हुए उनका चयन किया है।
शिक्षा के साथ संस्कृति की पाठशाला भी चला रहीं
प्रधानाध्यापिका के रूप में शिक्षा की जिम्मेदारी निभाने के साथ डॉ. पम्मी नवल लंबे समय से पारंपरिक जागरों और लोक गायन के माध्यम से पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का कार्य कर रही हैं। उनके जागर उत्तराखंड की लोक आस्था, देवी-देवताओं, सामाजिक परंपराओं और पहाड़ी जीवन की विविध रंगत को स्वर देते हैं। उनकी गायकी ने लोक परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
डॉ. पम्मी नवल की पहचान केवल एक शिक्षिका या लोक गायिका तक सीमित नहीं है। वह आज पहाड़ की उन महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं, जो अपनी प्रतिभा के बल पर शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक क्षेत्र में नई पहचान कायम करना चाहती हैं। उन्होंने यह संदेश दिया है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा जा सकता है।
उनका शिक्षक गौरव सम्मान के लिए चयन होने से क्षेत्र में खुशी की लहर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि डॉ. पम्मी नवल का सम्मान वास्तव में उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पहाड़ी महिलाओं की प्रतिभा और शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित शिक्षकों का सम्मान है।
लोक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना लक्ष्य
डॉ. पम्मी नवल का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और जड़ों से जोड़ना भी है। उनका प्रयास है कि उत्तराखंड की सदियों पुरानी लोक परंपराएं आधुनिक दौर में भी जीवंत रहें और आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करें।






