उत्तर प्रदेश

बीए–बीएड के कूट–रचित दस्तावेजों का बड़ा खेल! एक ही नामांकन नंबर पर दो-दो पहचान, नियुक्ति पर सवालों का पहाड़

मार्कशीट में धर्मपाल, आरटीआई में धर्मवीर… जन्मतिथि भी अलग!—शिक्षा विभाग की जांचों में गोलमोल जवाब, जिले में मचा प्रशासनिक हड़कंप

जन एक्सप्रेस संभल/मुरादाबाद।शिक्षा विभाग में फर्जी मार्कशीट और कूट–रचित बीएड डिग्री के सहारे प्रवक्ता पद पर हुई कथित नियुक्ति ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। पूरा मामला अब बड़े प्रशासनिक घोटाले की ओर इशारा कर रहा है, जिसमें बीए की मार्कशीट, बीएड की डिग्री, जन्मतिथि, यहां तक कि पूरा नाम—सब कुछ संदिग्ध! सबसे बड़ा सवाल—एक ही नामांकन संख्या (886985) और रोल नंबर (52264) पर दो अलग-अलग व्यक्ति कैसे? मार्कशीट में एक नाम… RTI में दूसरा! बीए तृतीय वर्ष (1991), एस.एम. डिग्री कॉलेज चंदौसी की मार्कशीट पर नाम धर्मपाल सिंह, जन्मतिथि 21-03-1971, जबकि RTI के जवाब में आया—धर्मवीर सिंह, वही नामांकन संख्या, वही रोल नंबर, जन्मतिथि 19-03-1971। यही नहीं, कॉलेज रिकॉर्ड में बीए उत्तीर्ण करने वाला असली छात्र धर्मवीर सिंह बताया गया है।

बीएड की कूट–रचित डिग्री ने खोला बड़ा राज

साक्ष्यों में सामने आया कि नियुक्ति के लिए प्रस्तुत बीएड की डिग्री— हस्तलिखित,जबकि 1994 बैच की बाकी सभी बीएड डिग्रियाँ कंप्यूटराइज्ड हैं।उसी बैच के विद्यार्थियों ने भी साफ कहा—”ऐसा कोई व्यक्ति न परीक्षा में दिखा, न प्रैक्टिकल में।”यानी जिस व्यक्ति की बीए भी प्रमाणित नहीं, उसकी बीएड डिग्री भी सवालों में।

शिक्षा विभाग की जांचों में ‘मानवीय भूल’ की आड़?

कथित आरोपी पर आरोप है कि उसने किसी धर्मेंद्र कुमार यादव के दस्तावेजों का भी उपयोग किया।पहली जांच में यह सामने आया, लेकिन बाद में शिक्षा निदेशक ने इसे “मानवीय भूल” बताकर आगे बढ़ा दिया।दूसरी और तीसरी जांच में तो—बीए और एमए के दस्तावेजों की जांच ही नहीं की गई!जिलाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा। शिक्षा निदेशक का बयान और भी चौंकाने वाला—
“जांच नहीं, सिर्फ सुनवाई की थी।”

विभाग के भीतर सवाल उठ रहा है कि—बिना जांच किए किस आधार पर सुनवाई? किस आधार पर नियुक्ति? सबसे बड़ा प्रश्न—यदि बीए ही उत्तीर्ण नहीं, तो स्थानांतरण पत्र कैसे जारी हुआ? शिक्षा विभाग की चुप्पी और बार-बार गोलमोल जवाबों ने पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बना दिया है। डीआईओएस, जेडी और निदेशालय स्तर पर जारी भ्रमित करने वाले उत्तरों से मामला और उलझता जा रहा है।

जनता और पत्रकारों की प्रतिक्रिया—“यह सिर्फ फर्जीवाड़ा नहीं, पूरा नेटवर्क है!”

स्थानीय लोगों और शिक्षा जगत में चर्चा है कि इस मामले में कई अधिकारी व कर्मचारी शामिल हो सकते हैं, वरना—
हस्तलिखित बीएड, दो अलग-अलग तिथियाँ, दो अलग नाम… और फिर भी नियुक्ति—यह बिना संरक्षण संभव नहीं!

मामला अब बड़े खुलासे की ओर—प्रशासन पर बढ़ा दबाव

जिलाधिकारी कार्यालय से जांच भले शुरू हुई हो, लेकिन आगे न बढ़ने पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि इतनी गंभीर शिकायतें वर्षों से लंबित हैं, तो कहीं विभाग के भीतर ही “सुरक्षा कवच” तो नहीं? यह पूरा प्रकरण शिक्षा विभाग के भीतर दस्तावेजों की सत्यता, नियुक्तियों की शुचिता और प्रमाण पत्रों की जांच प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।अगर यह फर्जीवाड़ा सिद्ध होता है, तो यह प्रदेश में शिक्षक नियुक्तियों के सबसे बड़े घोटालों में से एक साबित हो सकता है।

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