शिव नगरी उत्तरकाशी के प्राचीन मंदिर प्रचार के अभाव में उपेक्षित, पर्यटन बढ़ाने की उठी मांग

जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: उत्तरकाशी को देवभूमि और शिव नगरी के रूप में जाना जाता है। गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध उत्तरकाशी में काशी विश्वनाथ, कंडार देवता, कोटेश्वर महादेव और परशुराम मंदिर सहित तीन दर्जन से अधिक प्राचीन एवं पौराणिक मंदिर मौजूद हैं। बावजूद इसके, प्रचार-प्रसार के अभाव में अधिकांश तीर्थयात्री इन धार्मिक स्थलों तक नहीं पहुंच पाते।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गंगोत्री यात्रा से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन को विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन नगर के अन्य प्राचीन मंदिरों और घाटों की जानकारी यात्रियों तक नहीं पहुंच पाती।
सामाजिक कार्यकर्ता अजय प्रकाश बडोला पिछले 10 वर्षों से अपने स्तर पर पोस्टर और स्टीकर लगाकर तीर्थयात्रियों को मंदिरों का रास्ता दिखाने का कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि यात्रियों को आसपास के धार्मिक स्थलों की जानकारी मिले तो स्थानीय व्यापार और मंदिरों की आय दोनों में बढ़ोतरी हो सकती है।
स्थानीय लोगों ने मणिकर्णिका घाट और पंजाब सिंध घाट पर होने वाली गंगा आरती के व्यापक प्रचार की भी मांग की है। उनका कहना है कि अब केवल तीर्थयात्री ही नहीं, बल्कि युवा पर्यटक भी गांवों और प्राचीन मंदिरों को देखने में रुचि ले रहे हैं।
क्षेत्रवासियों ने सरकार से मांग की है कि सभी पौराणिक मंदिरों और घाटों की जानकारी देने वाले साइनबोर्ड, नक्शे और वेबसाइट तैयार की जाए। साथ ही होमस्टे योजना को गांवों के धार्मिक स्थलों से जोड़ा जाए, ताकि पर्यटक एक-दो दिन रुककर स्थानीय संस्कृति और मंदिरों का अनुभव कर सकें।
सामाजिक कार्यकर्ता देवी सिंह पंवार ने सेम मुखेम को पांचवें धाम के रूप में विकसित करने और उसके व्यापक प्रचार की मांग की है। वहीं होटल एसोसिएशन अध्यक्ष शैलेन्द्र मटूठा ने कहा कि दूरस्थ गांवों तक अच्छी सड़कें पहुंचने से पर्यटन को नई दिशा मिलेगी।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सरकार गांव-गांव के पौराणिक स्थलों को धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़े तो इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, पलायन रुकेगा और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी।






