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डॉ. चिन्मय पंड्या ने करुणा और विवेक आधारित तकनीक पर दिया जोर

जन एक्सप्रेस /हरिद्वार,  अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या इन दिनों कनाडा प्रवास पर हैं। जन्मशताब्दी वर्ष का संदेश लेकर वे कनाडा के प्रबुद्ध वर्ग, सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों को समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत कर रहे हैं।इसी क्रम में कनाडा के टोरंटो में विश्वप्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय परामर्शदाता संस्था डेलॉयट द्वारा आयोजित “जिम्मेदार एआई : वैश्विक विचारकों के साथ संवाद” विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. चिन्मय पंड्या ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विकास में नैतिकता, उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों की भूमिका पर अपने विचार रखे।उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति तभी सार्थक मानी जा सकती है, जब वह मानव कल्याण, संवेदनशीलता और वैश्विक उत्तरदायित्व से जुड़ी हो। डॉ. पंड्या ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन को नई दिशा देने और विकास की संभावनाओं को बढ़ाने की क्षमता रखती है, लेकिन यदि इसे नैतिकता और मानवीय मूल्यों से अलग कर दिया जाए तो इसके परिणाम गंभीर और चिंताजनक हो सकते हैं।अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय वैदिक दर्शन और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव ज्ञान और विज्ञान को लोकमंगल का माध्यम मानती रही है। यही दृष्टिकोण आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे उभरते क्षेत्रों में भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि करुणा, संवेदनशीलता और नैतिक चेतना से युक्त तकनीक ही मानवता के लिए वास्तव में उपयोगी सिद्ध हो सकती है।संगोष्ठी में उपस्थित अनेक अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भी इस बात पर सहमति व्यक्त की कि एआई के सुरक्षित, संतुलित और कल्याणकारी भविष्य के लिए भारतीय मूल्य-आधारित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।इस वैश्विक संवाद में एआई क्षेत्र के कई प्रमुख विशेषज्ञों ने भाग लिया। इनमें ग्लोबल एआई रिस्क इनिशिएटिव एट सीआईजीआई के कार्यकारी निदेशक डंकन कैस-बेग्स, डेलॉयट की डेटा एंड एनालिटिक्स स्ट्रेटेजी लीडर प्रीति शिवपुरी तथा हेल्थकेयर जनरेटिव एआई के ग्लोबल हेड नीरज डालमिया प्रमुख रूप से शामिल रहे।डॉ. चिन्मय पंड्या का यह संबोधन तकनीकी विकास और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में भारतीय चिंतन की वैश्विक स्वीकार्यता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

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