
जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: बच्चा जन्म के बाद नहीं, बल्कि मां की कोख से ही सीखना शुरू कर देता है। इसी विचार और भारतीय संस्कार परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज हरिद्वार 1 से 15 जुलाई तक “गर्भोत्सव संस्कार” ऑनलाइन शॉर्ट टर्म मॉड्यूलर कोर्स का आयोजन कर रहा है।
शांतिकुंज के विशेषज्ञों के अनुसार यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां और गर्भस्थ शिशु के सर्वांगीण विकास की एक वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक पहल है। उनका मानना है कि मां के विचार, आहार, व्यवहार और मानसिक स्थिति का सीधा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है।
कोर्स के दौरान गर्भ संवाद, मां और शिशु के बीच मानसिक जुड़ाव, सात्विक आहार-विहार, योग, प्राणायाम, तनावमुक्त गर्भावस्था, मंत्र चिकित्सा, गायत्री मंत्र, स्वर-लहरी तथा संस्कार विज्ञान जैसे विषयों पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन देंगे। साथ ही गर्भाधान से जन्म तक की संस्कार प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी भी प्रदान की जाएगी।
शांतिकुंज के विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी गर्भकाल को शिशु के विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था मानते हैं। इसी क्रम में यूनिसेफ के “पहले 1000 दिन” संबंधी अध्ययन और विश्वभर में चल रहे फिटल एजुकेशन (Fetal Education) शोधों का भी उल्लेख किया जाता है। उनका मानना है कि भारत की प्राचीन गर्भ संस्कार परंपरा को आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़कर समाज के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या के अनुसार, समाज निर्माण की शुरुआत गर्भकालीन संस्कारों से होती है। उन्होंने कहा कि यदि गर्भावस्था के दौरान सकारात्मक संस्कारों पर ध्यान दिया जाए तो आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
यह कोर्स पूरी तरह ऑनलाइन होगा, जिससे देश-विदेश में रहने वाली गर्भवती महिलाएं, उनके पति तथा परिवार के सदस्य भी इसमें भाग ले सकेंगे। आयोजकों के अनुसार कोर्स में भागीदारी के लिए कोई शुल्क निर्धारित नहीं है तथा इच्छुक प्रतिभागी ऑनलाइन पंजीकरण कर सकते हैं।
आयोजन देव संस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा किया जा रहा है।





